आज मेरी बेटी की सगाई है। अगर गायक नहीं आया तो मेरी इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी। मैंने उसे पूरे ₹20 लाख दिए थे। ऐन वक्त पर वो क्यों नहीं आ रहा? [संगीत] तेरी औकात है गाना गाने की। तू जानता भी है ये किसकी सगाई है। ₹ लाख दिए थे। जो खुद को चुप कराएंगे वक्त पर वो क्यों नहीं आ रहा? 10 करोड़ दूंगा। करोड़ रुपए तैयार रखो। मैं यह करके दिखाऊंगा। जयपुर शहर की यह सगाई सिर्फ एक पारिवारिक कार्यक्रम नहीं थी। यह शहर की सबसे बड़ी सामाजिक घटना थी। नाम ऐसा था कि सुनते ही लोग सीधा खड़े हो जाए। करण मल्होत्रा, करोड़ों का कारोबार, अखबारों में छपी
तस्वीरें, टीवी चैनलों पर चर्चा और आज उसकी बेटी की सगाई। जयपुर का पांच सितारा रिसोर्ट पूरी तरह रोशनी में डूबा हुआ था। झूमर ऐसे चमक रहे थे जैसे आसमान खुद नीचे उतर आया हो। हर कोना सजाया गया था। हर दीवार पर रोशनी नाच रही थी और हर मेहमान को यह एहसास कराया जा रहा था कि वह किसी मामूली कार्यक्रम में नहीं बल्कि एक यादगार इतिहास का हिस्सा बनने आया है। हर टेबल पर गोल्डन प्लेट्स रखी थी जिनमें विदेशी फूलों की खुशबू घुली हुई थी। लाइव कुकिंग काउंटरों से तरह-तरह के व्यंजनों की महक आ रही थी। बीच में एक विशाल स्टेज बनाया गया था। जिस पर इतनी लाइट्स लगी थी
कि आंखें कुछ पल के लिए चौंधियां जाए। स्टेज के पीछे लगी एलआईडी स्क्रीन पर मंगेतर जोड़े की स्लो मोशन क्लिप्स चल रही थी। कभी मुस्कान, कभी आंखों का मिलना, कभी हाथ थामे चलना। सब कुछ परफेक्ट दिखाया जा रहा था। लेकिन उस सारी चमकदमक के बीच एक चीज साफ तौर पर गायब थी। आवाज जिस मशहूर गायक को करण मल्होत्रा ने करोड़ों रुपए देकर बुक किया था, वह ऐन वक्त पर नहीं पहुंचा। ना उसका फोन उठा, ना उसका मैनेजर मिला। बस एक ठंडा सा मैसेज आया था। सॉरी कुडंट मेक इट। उस एक लाइन ने पूरे समारोह की नीव हिला दी थी। करण मल्होत्रा का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा था। उसकी आंखों
में वह आग थी जो सिर्फ वही लोग समझ सकते हैं जिन्हें अपनी इज्जत पैसों से भी ज्यादा प्यारी होती है। मैंने पूरा पैसा दिया था। वह दांत पीसते हुए बोला, पूरा। इवेंट मैनेजर उसके सामने पसीने में डूबा खड़ा था। उसके माथे से पसीने की बूंदे टपक रही थी। हाथ कांप रहे थे। आवाज लड़खड़ा रही थी। सर हम कोशिश कर रहे हैं। उसने हिम्मत जुटाकर कहा करण गरजा कोशिश से मेरी इज्जत वापस आ जाएगी क्या? मेहमानों के बीच हलचल शुरू हो चुकी थी। कोई कान्हा फूंसी कर रहा था। कोई मोबाइल निकाल कर मैसेज भेज रहा था। इतनी बड़ी सगाई और गायक गायब। अरे मल्होत्रा का फंक्शन भी फेल हो सकता है।
स्टेज खाली था। लाइट्स पूरी तरह जल रही थी। माइक तैयार था लेकिन गाने वाला कोई नहीं था और उस खालीपन ने पूरे हॉल को भारी बना दिया था। उसी हॉल के एक कोने में खाने की कतार के पास एक लड़का चुपचाप खड़ा था। उसकी उम्र करीब 15 साल थी। उसने फटा हुआ कुर्ता पहन रखा था। रंग ओढ़ा हुआ पायजामा था और पैरों में चप्पल थी जिसकी एक पट्टी टूटी हुई थी। जिसे उसने धागे से बांध रखा था। वह ना तो मेहमान था और ना ही स्टाफ का हिस्सा। असल में किसी ने उसे नोटिस ही नहीं किया था। वह बस खाना खा रहा था। बहुत धीरे-धीरे जैसे डर हो कि कोई देख ना ले और
उसे वहां से भगा ना दे। उस लड़के का नाम आदित्य था। उसकी प्लेट में साधारण दाल और चावल थे। लेकिन उसके लिए वह किसी दावत से कम नहीं थे। दो दिन से उसने ठीक से कुछ नहीं खाया था। आदित्य के कानों में हॉल का शोर नहीं जा रहा था। वह शोर नहीं। बल्कि खालीपन सुन रहा था। स्टेज का खालीपन, माइक की चुप्पी। उसने आसपास खड़े लोगों की बातें सुनी। गायक नहीं आया। इतना पैसा डूब गया। अब बेटी की सगाई शर्म के लिए याद रखी जाएगी। आदित्य ने खाना खाते-खाते सिर उठाया और उसकी नजर स्टेज पर टिक गई। उसने ऐसा स्टेज पहले भी देखा था। कभी टीवी पर, कभी मोबाइल दुकानों के बाहर लगे स्क्रीन
पर और कभी-कभी मंदिर के भजन कार्यक्रमों में। उसके गले में हल्की सी हरकत हुई जैसे कोई स्वर अंदर से धक्का दे रहा हो। उसकी मां कहा करती थी तू जब गाता है ना तो लगता है भूख भी चुप हो जाती है। आदित्य के गले में उठी वह हल्की सी हरकत सिर्फ एक एहसास नहीं थी। वह उस खालीपन की आवाज थी जिसे वह बरसों से अपने भीतर दबाए हुए था। उसकी मां कहा करती थी कि जब वह गाता है तो घर की दीवारें भी कुछ देर के लिए थकान भूल जाती हैं। आदित्य ने कई बार सोचा था कि यह सिर्फ मां का प्यार है। लेकिन आज उस खाली स्टेज को देखते हुए उसे पहली बार लगा कि
शायद उसकी आवाज सच में किसी जगह भर सकती है। उसने प्लेट नीचे रख दी। हाथ अपने कपड़ों से पोंछे। दिल इतनी जोर से धड़क रहा था कि उसे लगा आसपास खड़े लोग भी सुन लेंगे। वह जानता था कि वह फटे कपड़े पहने हैं। वह इस जगह का नहीं है और वह करोड़पति के सामने खड़ा होने लायक नहीं है। यह भी जानता था कि अगर वह आज नहीं बोला तो शायद जिंदगी भर नहीं बोल पाएगा। वह गा सकता है। यह बात उसके भीतर किसी सच की तरह बैठी हुई थी। अचानक उसने खुद को चलते हुए पाया। पहले एक कदम फिर दूसरा। उसके पैर भारी लग रहे थे। जैसे जमीन पकड़ कर रोक रही हो। वह
लोगों के बीच से गुजरता हुआ आगे बढ़ा। किसी ने उसे घूर कर देखा। किसी ने अनदेखा कर दिया। किसी ने बस रास्ता छोड़ दिया। किसी को अंदाजा नहीं था कि यह लड़का उस खाली स्टेज की तरफ नहीं बल्कि सीधे करण मल्होत्रा की तरफ बढ़ रहा है। करण उस वक्त इवेंट मैनेजर पर चिल्ला रहा था। उसकी आवाज में गुस्सा था। बेइज्जती का डर था और वह अहंकार था जो बड़े नामों के साथ खुद ब खुद आ जाता है। तभी भीड़ के बीच से एक धीमी लेकिन साफ आवाज उभरी साहब अगर आप चाहे तो मैं गा दूं एक पल के लिए लगा जैसे किसी ने पूरे हॉल की आवाज बंद कर दी हो। चारों तरफ
सन्नाटा छा गया। लोग पलट कर देखने लगे कि यह आवाज किसकी है। करण ने गुस्से में मुड़कर देखा। सामने एक दुबला पतला लड़का खड़ा था। फटे कपड़े, झुकी हुई आंखें। लेकिन आवाज में अजीब सा भरोसा था। करण के चेहरे पर एक कड़वी तेज हंसी फैल गई। तू समझता है यह सगाई है या कोई सड़क का तमाशा। आदित्य ने सिर उठाया। पहली बार उसकी आंखें सीधे करण मल्होत्रा से मिली। वह नजरें जो अब तक जमीन पर रहती थी। आज बिना डरे सामने थी। उसने एक सांस ली और बोला अगर अगर मैं गा दिया और आपको पसंद आया तो आप कहेंगे क्या? उसके शब्द कांप रहे थे लेकिन आवाज नहीं। करण की आंखों में
एक चिंगारी सी चमकी। शायद उसे यह साहस मजाक लगा। शायद चुनौती। उसने उंगली उठाई और बोला अगर तू सच में गा दिया और मेरा मान बचा लिया तो मैं तुझे 10 करोड़ दूंगा। यह कहते वक्त उसकी आवाज ऊंची थी, साफ थी और पूरे हॉल ने सुन लिया। हॉल में जैसे किसी ने सांस रोक दी हो। कुछ लोगों को लगा उन्होंने गलत सुन लिया है। कुछ ने सोचा यह बस एक अमीर आदमी का गुस्सा है और कुछ को यकीन हो गया कि यह रात अब किसी ना किसी वजह से याद रखी जाएगी। आदित्य ने पहली बार हल्की सी मुस्कान दी। पूरा हॉल जैसे पत्थर का हो गया था। कोई बोला नहीं। कोई हंसा नहीं। सिर्फ एक वाक्य हवा में अटका हुआ
था। मैं तुझे 10 करोड़ दूंगा। आदित्य कुछ सेकंड चुप खड़ा रहा। उसके कानों में शोर नहीं था। सिर्फ दिल की धड़कन थी। ठक ठक ठक 10 करोड़। इतना पैसा उसने कभी गिना नहीं था। उसने तो ₹100 का नोट भी अक्सर उधार में देखा था। लेकिन उस पल वह पैसों के बारे में नहीं सोच रहा था। वह उस मौके के बारे में सोच रहा था जो शायद जिंदगी में एक ही बार मिलता है। करण मल्होत्रा ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा। क्या नाम है तेरा? उसने पूछा। आदित्य लड़के ने धीरे से कहां से आया है यहीं पास की झुग्गी से साहब किसी को खांसी आ गई किसी ने मुंह दूसरी तरफ कर लिया एक रिश्तेदार ने फुसफुसाकर
कहा भाई यह क्या मजाक चल रहा है इवेंट मैनेजर आगे बढ़ा सर रहने दीजिए यह बच्चा है भीड़ और नाराज हो जाएगी करण ने हाथ उठाकर उसे चुप करा दिया उसकी नजर अब आदित्य से नहीं हट रही थी सुन करण ने कहा अगर तू फेल हुआ ना तो लोग कहेंगे कि मल्होत्रा ने अपनी बेटी की सगाई सर्कस बना दी। आदित्य ने सिर हिलाया। समझता हूं साहब। उसने हल्की सी सांस ली। डर तो लगता है लेकिन गाने से कम। पहली बार करण की भें थोड़ी ढीली पड़ी। किसी बुजुर्ग ने पीछे से कहा। अरे छोड़िए। बच्चे का दिल टूट जाएगा। किसी और ने ताना मारा। झुग्गी का लड़का और 10 करोड़। वाह। आदित्य ने स्टेज की तरफ
देखा। माइक चमक रहा था। लाइट्स उसकी आंखों में चुभ रही थी। क्या गाएगा? डीजे ने ऊपर से पूछा। आदित्य ने कहा वही गाना जो आज गायक को गाना था। हॉल में हलचल हुई। किसी ने कहा वह बहुत मुश्किल गाना है। करण ने ठंडी आवाज में कहा अगर तू वही गाएगा तभी बात बनेगी। आदित्य ने बिना रुके कहा ठीक है। आदित्य ने स्टेज पर पहला कदम रखा। उसी पल उसे लगा जैसे जमीन हिल रही हो। असल में जमीन नहीं उसके घुटने कांप रहे थे। लाइट्स सीधे आंखों पर पड़ रही थी। नीचे बैठे लोग अब चेहरे नहीं सिर्फ परछाइयां लग रहे थे। माइक उसके कद से थोड़ा ऊंचा था। एक
टेक्नशियन दौड़ कर आया और स्टैंड नीचे किया। साउंड चेक। उसने पूछा। आदित्य ने हल्के से सिर हिलाया। उसकी आवाज गले में फंसी हुई थी। इंस्ट्रूमेंटल शुरू हुआ। वही गाना वही इंट्रो। पहले दो सेकंड आदित्य ने कुछ नहीं किया। उसने आंखें बंद कर ली। उसके सामने झुग्गी आ गई। टूटी छत, मां का थका चेहरा, रेलवे प्लेटफार्म जहां वह शाम को गाता था और लोग सिक्के फेंकते थे। उसने एक लंबी गहरी सांस ली और पहला सुर निकला। जैसे ही उसकी आवाज गूंजी, पूरा हॉल चुप हो गया। किसी ने खांसा नहीं, किसी ने फुसफुसाया नहीं। जिन हाथों में मोबाइल उठे हुए थे वे वहीं थम गए। जिन प्लेटों में
खाना था वे नीचे रख दी गई। आदित्य की आवाज में कोई दिखावा नहीं था। ना कोई जानबूझकर खींचा गया ऊंचा सुर ना कोई ताली बटोरने की चाल। बस दर्द था और सच्चाई। ऐसी सच्चाई जो शोर से भरे कमरे में अचानक खुली खिड़की की तरह लगती है। पहली लाइन खत्म होते-होते एक महिला ने अपने पास बैठे आदमी का हाथ पकड़ लिया। किसी की आंखें अपने आप भर आई। पीछे बैठे एक आदमी ने अनजाने में गिलास नीचे रख दिया। करण मल्होत्रा की भहें जो अब तक तनी हुई थी। धीरे-धीरे ढीली पड़ने लगी। उसकी आंखें अब गुस्से से नहीं। ध्यान से देख रही थी। दूसरी लाइन में आदित्य की आवाज और
खुल गई। जैसे डर पीछे छूट गया हो। सुर अब कांप नहीं रहे थे। वह गा नहीं रहा था। वह जी रहा था। पीछे बैठे एक लोकल म्यूजिशियन ने अपने पास बैठे आदमी से धीमे से कहा, “यह बच्चा सीखा हुआ नहीं है। यह भुगता हुआ है।” कोरस आया वही मुश्किल हिस्सा जहां असली गायक अक्सर जोर लगाकर तालियां बटोरता था। आदित्य ने वहां आवाज नहीं बढ़ाई। उसने उसे थाम लिया और वही बात लोगों के दिल में उतर गई। एक आदमी जो अब तक खाने में बिजी था। उसने अपनी थाली नीचे रख दी। एक नेता जो फोन पर बात कर रहा था उसने कॉल काट दी। करण को पहली बार महसूस हुआ कि हॉल अब उसकी
इज्जत के लिए चुप नहीं था। हॉल उस लड़के के लिए चुप था। गाना आगे बढ़ता गया। हर लाइन के साथ सन्नाटा और गहरा होता गया। जब आखिरी लाइन आई आदित्य ने आंखें खोल दी। उसकी नजर सीधे करण मल्होत्रा से मिली। आवाज थोड़ी भारी हो गई लेकिन टूटी नहीं। आखिरी स्वर हवा में थम गया। जैसे किसी ने उसे जाने ही नहीं दिया हो। एक सेकंड, दो सेकंड, फिर कहीं पीछे से एक धीमी ताली बजी। फिर दूसरी। फिर देखते ही देखते पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा। आदित्य माइक से थोड़ा पीछे हटा। उसे लगा अब बस हो गया। लेकिन तभी नीचे से एक आवाज आई। एक और। करण मल्होत्रा जो शर्त लगाकर खड़ा था। अब बिना
कुछ बोले स्टेज की तरफ बढ़ने लगा। तालियों की आवाज अभी थमी भी नहीं थी कि वह स्टेज के पास आकर रुक गया। पूरा हॉल खड़ा था। कुछ लोग सच में खड़े थे। कुछ अंदर से आदित्य को समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। वह माइक के पास खड़ा था जैसे किसी ने उसे वहीं जमा दिया हो। नीचे से आती रोशनी में उसे अपने फटे कपड़े और ज्यादा साफ दिख रहे थे। उसे अचानक याद आया कि वह यहां सिर्फ गाने आया था। इतनी नजरों के लिए नहीं। कर्ण ने हाथ उठाया। तालियां धीरे-धीरे रुक गई। नाम क्या बताया था? कर्ण ने माइक की तरफ झुक कर पूछा। आदित्य, लड़के ने धीमे से कहा। कर्ण ने उसे 2
सेकंड देखा। फिर बोला, तू जानता है तूने अभी क्या किया? आदित्य ने सिर हिला दिया। नहीं साहब। कर्ण ने सामने बैठे मेहमानों की तरफ देखा। आप लोगों ने किया। उसने कहा जो आज तक किसी महंगे सिंगर ने नहीं किया। हॉल में हल्की सी सरगर्मी हुई। इसने मुझे बचाया। कर्ण ने साफ कहा। लेकिन उससे पहले इसने मुझे शर्मिंदा किया। कुछ लोग चौंक गए। आदित्य का दिल बैठ गया। शर्मिंदा इसलिए कर्ण ने आगे कहा क्योंकि मैं समझता था कि पैसा आवाज खरीद सकता है। वह आदित्य की तरफ मुड़ा। पर यह लड़का यह खाली पेट आया। फटे कपड़ों में आया और मेरी बेटी की सगाई में जान डाल गया। आदित्य की आंखें भर
आई। वह नीचे देखने लगा। मैंने कहा था करण ने कहा अगर तू गा दिया तो 10 करोड़ दूंगा हॉल में फिर से सन्नाटा छा गया लेकिन अब मुझे लग रहा है कि यह शर्त गलत थी आदित्य ने घबराकर ऊपर देखा उसके होंठ सूख गए क्योंकि 10 करोड़ गाने की कीमत नहीं हो सकती ने कहा पैसा मैं दूंगा लेकिन सौदे की तरह नहीं वह स्टेज पर चढ़ गया आदित्य से सिर्फ एक कदम दूर तू आज से किसी की दया पर नहीं जिएगा उसने कहा ना मेरी ना किसी और की। फिर उसने माइक लेकर हॉल से कहा आज यह लड़का हमारा एंटरटेनर नहीं है। यह हमारी कहानी है। तालियां फिर गूंजी इस बार और जोर से आदित्य को लगा जैसे उसके सीने पर
रखा कोई भारी पत्थर हट गया हो। लेकिन डर अभी भी कहीं था क्योंकि जिंदगी इतनी आसानी से नहीं बदलती। एक और गाना गाएगा। करण ने पूछा। आदित्य ने सिर हिलाया। इस बार कांप नहीं रहा था। लेकिन अपनी पसंद का करण ने कहा। आदित्य की आंखें चमक गई। उसने माइक संभाला। यह गाना उसने कहा मैं मां के लिए गाता हूं। इंस्ट्रूमेंटल शुरू हुआ। साधारण धुन कोई भारी अरेंजमेंट नहीं। जैसे ही आदित्य ने गाना शुरू किया। हॉल में बैठे कई लोगों को अपनी मां याद आ गई। और करण मल्होत्रा जिसने जिंदगी में बहुत कुछ जीता था। आज पहली बार चुपचाप हार मान रहा था।
गाना खत्म होने से पहले ही हॉल का माहौल बदल चुका था। यह अब सिर्फ सगाई का हॉल नहीं लग रहा था। यह किसी की जिंदगी का मोड़ बन चुका था। आदित्य की आवाज में इस बार झिझक नहीं थी। उसमें थकान थी, संघर्ष था और एक अजीब सी शांति थी। जब आखिरी लाइन खत्म हुई तो तालियां तुरंत नहीं आई। पहले सन्नाटा था गहरा और सम्मान भरा। फिर एक महिला खड़ी हुई। उसने बिना कुछ कहे ताली बजाई। उसके बाद एक आदमी उठा। फिर एक टेबल फिर पूरा हॉल स्टैंडिंग ओवेशन में बदल गया। आदित्य ने माइक नीचे रखा। उसके हाथ अब भी कांप रहे थे लेकिन डर से नहीं भावनाओं से। वह स्टेज से उतरने ही वाला था
कि करण मल्होत्रा ने उसका हाथ पकड़ लिया। रुक। उसने कहा अभी नहीं। करण ने इशारा किया और एक आदमी स्टेज पर आया। सूट बूट में सफेद बाल, आंखों में अनुभव। यह है शेखर मल्होत्रा। करण ने कहा 20 साल से म्यूजिक इंडस्ट्री में है। शेखर ने आदित्य को काफी देर तक देखा जैसे किसी चीज को परख रहा हो। कहां सीखा? उसने पूछा आदित्य ने सच कहा। कहीं नहीं सर जहां मौका मिला वहीं गा लिया। शेखर मुस्कुराया। यही सबसे मुश्किल स्कूल होता है। फिर उसने करण की तरफ देखा। यह लड़का कच्चा है। उसने साफ कहा लेकिन इसमें वह है जो अकादमी नहीं सिखा सकती। करण ने सिर हिलाया तो आप
संभालेंगे। शेखर ने बिना रुके कहा अगर यह बच्चा चाहे पूरा हॉल यह बातचीत सुन रहा था। आदित्य को लग रहा था जैसे बातें किसी और के बारे में हो रही हो। मैं उसने बोलने की कोशिश की। करण झुक कर उसके पास आया और धीरे से बोला, डर मत। आज कोई तुझसे कुछ छीन नहीं रहा। सिर्फ दे रहा है। आदित्य की आंखें भर आई। तभी पीछे से एक आवाज आई। यह लड़का हमारे स्कूल में पढ़ सकता है। एक महिला आगे आई। हम एनजीओ से हैं। उसने कहा, “इसकी पढ़ाई हमारी जिम्मेदारी। फिर एक और आदमी बोला, “मेरे पास छोटा सा स्टूडियो है। रिकॉर्डिंग फ्री रहेगी।” आदित्य को
समझ नहीं आ रहा था कि किसे देखें, किसे सुने। उसकी दुनिया जो अब तक तीन गलियों में सिमटी थी, अचानक फैल रही थी। करण ने माइक उठाया। आज एक बात साफ हो गई है। उसने कहा अगर टैलेंट को मंच नहीं मिलता तो मंच बेमतलब हो जाता है। फिर उसने आदित्य के कंधे पर हाथ रखा और 10 करोड़ उसने हल्की मुस्कान के साथ कहा। हॉल फिर चुप हो गया। वो तेरे खाते में नहीं जाएंगे। वो तेरे नाम से एक ट्रस्ट में जाएंगे। तेरी पढ़ाई, तेरा म्यूजिक और तेरे जैसे और बच्चों के लिए आदित्य फूट-फूट कर रो पड़ा। पहली बार उसके आंसुओं में डर नहीं था। सिर्फ शुरुआत थी। सगाई खत्म हो चुकी थी। मेहमान जा चुके
थे। लाइट्स धीरे-धीरे बंद हो रही थी। लेकिन आदित्य के लिए रात अभी खत्म नहीं हुई थी। वह स्टेज के पीछे एक कुर्सी पर बैठा था। उसके पैर जमीन तक ठीक से नहीं पहुंच रहे थे। हाथों में वही पुराना रुमाल था जिससे वह कभी पसीना पोंछता था और कभी अपनी मां के लिए सब्जी बांधता था। अब उसी रुमाल से वह बार-बार अपनी आंखें पोंछ रहा था। करण मल्होत्रा उसके सामने बैठे थे। अब उनके चेहरे पर गुस्सा नहीं था। अहंकार नहीं था। सिर्फ थकान और सुकून था। कभी सोचा था करण ने धीरे से पूछा कि एक दिन तू इस स्टेज पर बैठेगा? आदित्य ने सिर हिलाया। नहीं साहब, मैं तो बस भीड़ में
गुम हो जाना चाहता था। करण हल्का सा मुस्कुराए। आज भीड़ तुझे ढूंढ रही है। तभी इवेंट मैनेजर अंदर आया। हाथ में फोन था। सर उसने कहा वीडियो वायरल हो गया है। करण ने फोन देखा। आदित्य का गाना हजारों शेयर, लाखों व्यूज, कमेंट्स की लाइनें। यह लड़का कहां से आया? असली आवाज यही है। फटे कपड़े, लेकिन सोने का गला। आदित्य घबरा गया। अब लोग मुझे पहचान लेंगे। करण ने सिर हिलाया। पहचानेंगे लेकिन डरने की जरूरत नहीं क्योंकि अब तू अकेला नहीं है। सुबह होने लगी थी। आसमान हल्का नीला हो रहा था। करण ने अपने सेक्रेटरी को बुलाया। इस बच्चे और इसकी मां को आज ही मेरे गेस्ट
हाउस में शिफ्ट कराओ। आदित्य चौंक गया। नहीं साहब मां को अच्छा नहीं लगेगा। करण ने नरमी से कहा। इज्जत से रहना किसी एहसान से कम नहीं होता। कुछ देर बाद आदित्य को उसकी मां के पास ले जाया गया। वह घबराई हुई थी। तूने कुछ गड़बड़ तो नहीं कर दी? आदित्य ने सिर हिलाया। नहीं अम्मा, मैंने गाया। उसकी मां ने बेटे को देखा और रो पड़ी। तेरे बाप ने कहा था, उसने कांपती आवाज में कहा, एक दिन तेरा गाना हमारा सिर ऊंचा करेगा। उसी सुबह आदित्य को नए कपड़े दिए गए। लेकिन उसने पुराने कपड़े फेंके नहीं। यह मुझे याद दिलाते हैं। उसने कहा कि मैं कहां से आया हूं। करण मल्होत्रा ने
पहली बार किसी करोड़पति की तरह नहीं एक इंसान की तरह सिर झुकाया। तीन हफ्ते बीत चुके थे। बाहर से देखने पर आदित्य की जिंदगी पूरी तरह बदल चुकी थी। लेकिन अंदर कहीं वही डर अब भी बैठा हुआ था। वह अब कर्ण मल्होत्रा के गेस्ट हाउस में रहता था। कमरा साफ था। बिस्तर मुलायम था। खिड़की से सुबह की धूप सीधे अंदर आती थी। लेकिन कई रातें ऐसी होती थी जब वह सो नहीं पाता था। उसे लगता था कि यह सब सपना है और सपने अक्सर टूट जाते हैं। सुबह वह स्कूल जाता था। पहली बार उसके कंधे पर ठीक से बैठने वाला बैग था। शाम को म्यूजिक एकेडमी। वहां दीवारों पर बड़े-बड़े
सिंगर्स की तस्वीरें लगी थी। आदित्य उन्हें देखता और फिर अपनी तरफ देखता। कई बार उसे लगता कि वह यहां गलती से आ गया है। क्लास में बच्चे उसे घूरते थे। कुछ की नजरों में जिज्ञासा थी। कुछ में जलन, कोई फुसफुसाता। यही है वह वायरल लड़का। कोई कहता इसे तो सब फ्री में मिल रहा है। कोई हंसकर बोल देता किस्मत हो तो ऐसी। आदित्य चुप रहता था। वह जानता था कि यह मौका दोबारा नहीं मिलेगा। उसे यह भी पता था कि शोर मचाने से आवाज मजबूत नहीं होती। लेकिन असली झटका एक शाम को लगा। शेखर सर ने क्लास रुकवाई और सबको देखने के बाद आदित्य से कहा कल
तुम्हारा ऑडिशन है। आदित्य का दिल जैसे वहीं रुक गया। ऑडिशन एक बड़ा म्यूजिक प्रोजेक्ट है। शेखर बोले लाइव नहीं रिकॉर्डिंग। वहां ना ताली होगी ना भीड़। आदित्य का गला सूख गया। वहां सिर्फ आवाज चलेगी। शेखर ने साफ कहा और वहां लोग कहानी नहीं सुनते। परफेक्शन सुनते हैं। उस रात आदित्य ने खाना नहीं खाया। वह छत पर बैठा रहा। नीचे शहर की आवाजें थी। ऊपर उसके सवाल। अगर वह फेल हो गया तो अगर लोगों ने कहा कि वह बस एक दिन का चमत्कार था। उसकी मां चुपचाप आकर उसके पास बैठ गई। डर लग रहा है? उसने पूछा। आदित्य ने सिर हिलाया। तो अच्छा है। मां बोली डर मतलब तू कुछ खो
सकता है। जिसे कुछ खोना होता है वही दिल से करता है। अगले दिन स्टूडियो ठंडा था। कांच की दीवारें, हेडफोन, लाल बत्ती। रेडी आवाज आई। आदित्य ने आंखें बंद की। इस बार कोई भीड़ नहीं थी। कोई करण नहीं था। कोई तालियां नहीं थी। सिर्फ वह और उसकी आवाज। पहली टेक खराब गई। दूसरी भी। पीछे से किसी ने ताना मारा। वायरल लड़के से यही उम्मीद थी। आदित्य का दिल बैठ गया। शेखर ने इंटरकॉम बंद किया और अंदर आ गए। उन्होंने बस इतना कहा। भीड़ के लिए मत गाने अपने लिए गा। तीसरी टेक में आदित्य ने सांस ली और सब कुछ भूल गया। जब रिकॉर्डिंग खत्म हुई कोई
ताली नहीं बजी। बस एक आवाज आई। ठीक है। फाइनल टेक यही है। आदित्य बाहर निकला। उसके पैर भारी थे। उसी शाम करण मल्होत्रा का फोन आया। पास हो गया। आदित्य ने धीरे से कहा। हां। फोन के उस पार से सिर्फ एक वाक्य आया। अब कहानी शुरू हुई है बेटा। किसकी? आदित्य ने आसमान की तरफ देखा। पहली बार उसे डर नहीं लगा। एक साल बाद वहीं शहर था। वहीं लोग थे। लेकिन आदित्य वहीं नहीं रहा था। रेडियो पर एक नई आवाज बज रही थी। नाम नहीं बताया गया था। बस इतना कहा गया था। नई आवाज। पहली रिकॉर्डिंग। चाय की दुकानों पर लोग रुक गए। ऑटो में बैठे ड्राइवर ने
वॉल्यूम बढ़ा दिया। किसी ने कहा आवाज सुनी है? कुछ अलग है। उस आवाज में चमक नहीं थी। सच था। शेखर ने फोन पर बस इतना कहा, अब लोग तुझे ढूंढेंगे और सच में ढूंढा गया। इंटरव्यू आए, स्टेज शो आए, नाम आया आदित्य। हर जगह वही सवाल पूछा गया। आपको पहला मौका कैसे मिला? आदित्य हर बार वहीं जवाब देता। एक सगाई में जहां मैं सिर्फ खाना खाने गया था। लोग हंसते थे। उन्हें लगता था कहानी बनाई है। लेकिन करण मल्होत्रा जानते थे। उनकी बेटी जानती थी और वह खाली स्टेज भी जानता था। एक दिन आदित्य फिर उसी हॉल में खड़ा था। इस बार फटे कपड़ों में नहीं साधारण कुर्ते में।
आंखों में आत्मविश्वास था। वह गाने आया था। बिना फीस, बिना शर्त। स्टेज पर चढ़ते वक्त उसने नीचे देखा। किचन के पास कुछ बच्चे चुपचाप खड़े थे। काम करने वाले जैसे वह कभी था। आदित्य ने माइक पकड़ा और बोला अगर आज यहां कोई बच्चा है जिसे लगता है कि उसकी आवाज कोई नहीं सुनेगा तो यह गाना उसके लिए है। उसने गाया और इस बार हॉल सिर्फ सुन नहीं रहा था। समझ रहा था। गाना खत्म हुआ। तालियां आई। लेकिन आदित्य ने हाथ उठाकर उन्हें रोक दिया। वह स्टेज से नीचे उतरा। सीधे उन बच्चों के पास गया। कौन गाना चाहता है? उसने पूछा। एक छोटा सा हाथ उठा। आदित्य मुस्कुराया और माइक आगे
बढ़ा। क्योंकि कुछ कहानियां यहीं खत्म नहीं होती। वे यहीं से दूसरों के लिए शुरू होती हैं।
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