अगले कुछ दिन बाहर से सामान्य दिखे, लेकिन सुक्खी अपने अपराधबोध के साथ जी नहीं पाई। प्रसव के तीन रात बाद वह टूट गई। अँधेरे में दौड़ती हुई वह जंगल की ओर बनी उसी पुरानी झोपड़ी तक पहुँची, यह सोचते हुए कि शायद बच्चा मर चुका होगा।
पर जैसे ही वह पास आई, उसे एक धीमी-सी रुलाई सुनाई दी।
सुक्खी घुटनों के बल गिर पड़ी। “हे भगवान… चमत्कार,” उसने फुसफुसाया। उसने बच्चे को बाँहों में उठा लिया और उसी पल फ़ैसला कर लिया—वह उसे नहीं छोड़ेगी। वह उसे छुपकर पालेगी। उसने उसका नाम रखा: भास्कर।
पाँच साल बीत गए। हवेली में वीरेंद्र और भानु प्रताप राजकुमारों की तरह पल रहे थे। जंगल की छाया में, सुक्खी के प्रेम से भास्कर बड़ा हो रहा था। सुक्खी हर रात चोरी-छिपे उसके पास जाती—थोड़ा बचा खाना, रफ़ू की हुई कमीज़ ले जाती।
“तुझे दिखना नहीं है, मेरे लाल,” वह समझाती। “अगर ठाकुर को पता चला, तो हमें मार डालेंगे।”
सुक्खी की बेटी जोआना, अब ग्यारह बरस की, माँ की इन ग़ायबियों पर शक करने लगी। वह तेज़ थी। एक रात वह चुपचाप माँ के पीछे चली गई और झोपड़ी की एक दरार से उसने देखा—माँ किसी अनजान बच्चे को गोद में झुला रही है। उसी रात उसने सुक्खी से सामना किया।
“माँ, जंगल का वह बच्चा कौन है?”
सुक्खी ठिठक गई। बेटी की आँखों में झाँकते ही उसने सब सच बता दिया।
“क्या वह ठाकुर का बेटा है?” जोआना ने पूछा। सुक्खी ने सिर हिला दिया।
“तो वह हवेली के बच्चों का भाई हुआ,” जोआना बुदबुदाई। उसने राज़ रखने की क़सम खाई—पर यह सच उसे भीतर से बदल गया।
सब कुछ अगस्त की एक दोपहर ढह गया। दस बरस के हो चुके वीरेंद्र और भानु प्रताप अपनी आया से बचकर घोड़े पर निकल पड़े और जंगल की ओर बढ़ गए। ज़्यादा भीतर चले गए और उन्हें वह झोपड़ी दिख गई। वहाँ उन्होंने एक साँवले बच्चे को देखा—नंगे पाँव, उदास-सी धुन सीटी में बजाता हुआ।
गोरे कपड़ों में सजे दोनों बच्चों को देखते ही भास्कर सिहर गया।
“तुम कौन हो?” भानु प्रताप ने पूछा।
भास्कर चुप रहा। उसे सिखाया गया था—दिखना नहीं है।
“क्या तुम यहीं रहते हो?” भानु ने ज़ोर दिया, उसकी आँखों में अजीब-सा अपनापन देखकर।
डरा हुआ भास्कर बस सिर हिलाया। “माँ सुक्खी मुझे देखने आती हैं।”
नाम बिजली की तरह गिरा। दोनों भाई चुपचाप हवेली लौट आए। रसोई की दासी सुक्खी—और एक छुपा हुआ बच्चा जो उनसे इतना मिलता-जुलता?
उस रात वीरेंद्र ने तहक़ीक़ात की। वह सुक्खी के पीछे झोपड़ी तक गया और छुपकर सुना—
“मेरे लाल, एक दिन तू समझेगा कि तुझे क्यों छुपकर रहना पड़ा। पर तू किसी से कम नहीं—हवेली के किसी भी बच्चे से नहीं।”
सब कड़ियाँ जुड़ गईं—उम्र, मरा हुआ बताया गया भाई, शक्ल। शंका अब एक डरावनी सच्चाई बन चुकी थी।
दिसंबर की एक शाम दोनों भाइयों ने अपनी माँ कमला देवी से सामना किया।
“माँ,” वीरेंद्र ने कहा, “आपने उस भाई के बारे में झूठ बोला जो मर गया था।”
कमला देवी के हाथ से चाय का प्याला छूट गया। उनका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
“हमें सब पता है,” भानु प्रताप बोला। “हमने उसे देखा है। एक बच्चा छुपा हुआ है। सुक्खी उसकी देखभाल करती है। वह हमारा भाई है, है न?”
कमरे में सन्नाटा छा गया। कमला देवी फूट-फूटकर रो पड़ीं।
“हाँ,” उन्होंने हार मानते हुए फुसफुसाया। “वह तुम्हारा भाई है। तुम्हारे साथ ही पैदा हुआ था… पर उसकी त्वचा गहरी थी। मुझे तुम्हारे पिता से डर लगा। मैंने सुक्खी को उसे गायब करने का हुक्म दिया।”
“क्या आपने हमारे भाई को मरवाने का हुक्म दिया?” वीरेंद्र ने काँपती आवाज़ में पूछा।
उसी रात, ग़ुस्से से भरा वीरेंद्र अपने पिता ठाकुर हरिनाथ सिंह के दफ़्तर में घुसा।
“पिताजी, आपका एक और बेटा है। वह मरा नहीं। ज़िंदा है, छुपा हुआ। माँ ने सुक्खी को उसे हटाने को कहा क्योंकि वह साँवला पैदा हुआ था।”
ठाकुर हरिनाथ ने मेज़ पलट दी। पूरी हवेली गूँज उठी—
“सुक्खी!”
उसे आँगन में घसीट लाया गया और ठाकुर के पैरों में पटक दिया गया। उनके हाथ में चाबुक था।
“क्या तुमने मेरे बेटे को छुपाया?” वे गरजे।
सुक्खी ने घुटनों के बल बैठकर आँखें उठाईं। “हाँ, मालिक,” वह बोली। “मालकिन ने उसे मार देने को कहा था। मुझसे नहीं हुआ। मैंने भूख और ठंड में उसे जंगल में पाला—पर उसे मरने नहीं दिया।”
सच ने ठाकुर को निरस्त्र कर दिया। उन्होंने चाबुक गिरा दिया।
“वह कहाँ है?”
“पुरानी झोपड़ी में,” सुक्खी ने कहा।
“उसे अभी यहाँ लाओ!” ठाकुर ने सिपाहियों को आदेश दिया।
साँझ ढलते-ढलते भास्कर को आँगन में लाया गया—नंगे पाँव, डरा हुआ। उसने सुक्खी को घायल देखा और उसकी ओर दौड़ पड़ा। “माँ सुक्खी!” वह चीखा—पर उसे पकड़ लिया गया।
ठाकुर आगे बढ़े। उन्होंने बच्चे में अपने ही नयन-नक़्श देखे—आँखों की बनावट, चौकोर ठोड़ी। वह उनका बेटा था। उनका ख़ून। पत्नी के छुपाए सच की जीती-जागती गवाही।
उन्होंने बरामदे में रोती कमला देवी की ओर देखा। उनके भीतर कुछ टूट गया।
“यह बच्चा सिंह है,” ठाकुर ने घोषणा की। “मेरे ख़ून का है। ख़ून छुपाया नहीं जाता।”
फिर सुक्खी की ओर मुड़कर बोले, “तुमने मेरे बेटे की जान बचाई। मेरी पत्नी ने उसे मरवाना चाहा। इसलिए—तुम आज़ाद हो। और तुम्हारी बेटी भी।”
सुक्खी और जोआना राहत से रो पड़ीं।
ठाकुर भास्कर के सामने घुटनों पर बैठ गए। “तू मेरा बेटा है—समझा? तू किसी से कम नहीं। जो उल्टा बोलेगा, मुझसे बात करेगा।”
भास्कर ने उलझन में सुक्खी की ओर देखा। उसने आँसुओं के बीच मुस्कुराकर सिर हिलाया।
“जा, मेरे लाल,” वह बोली। “वह ज़िंदगी जी, जो हमेशा से तेरी थी।”
अगले सालों में सब कुछ बदल गया। भास्कर सिंह को हवेली में स्वीकार किया गया। उसने भाइयों के साथ पढ़ाई की, पढ़ना-लिखना और हारमोनियम बजाना सीखा। वह दो दुनियाओं के बीच बड़ा हुआ—हवेली का वारिस और दास बस्ती का बेटा, जो अब आज़ाद हो चुकी सुक्खी और जोआना के पास जाता रहता। उसने कभी अपनी जड़ों को नहीं भुलाया—और दीवार नहीं, पुल बनना चुना।
बीस बरस की उम्र में भास्कर ने फ़ैसला लिया। उसने अपनी विरासत का हिस्सा बेच दिया और उस पैसे से ज़मींदारी के दर्जनों बंधुआ मज़दूरों की आज़ादी ख़रीद ली।
बूढ़े और बीमार ठाकुर हरिनाथ सिंह ने यह सब देखा। मरने से पहले उन्होंने उस बेटे का हाथ थामा जिसे कभी ठुकराया गया था।
“तू मुझसे बेहतर है, भास्कर,” उन्होंने फुसफुसाया। “हम सब से बेहतर।”
सुक्खी पैंसठ बरस की उम्र में चली गई—भास्कर, जोआना और पोते-पोतियों से घिरी हुई। उसके अंतिम संस्कार में भास्कर ने उस खुरदरे हाथ को थामा जिसने उसे बचाया, उसे माँ की तरह प्यार किया।
“धन्यवाद, माँ,” उसने कहा। “मुझे जीने देने के लिए धन्यवाद।”
इस तरह, जो बच्चा मिटा दिए जाने के लिए पैदा हुआ था, वही परिवार की मुक्ति बन गया। उसकी ज़िंदगी ने साबित किया कि आत्मा की माँ का प्रेम नफ़रत से ज़्यादा ताक़तवर होता है—और सच, चाहे जितना छुपाया जाए, आख़िरकार रोशनी में लौट ही आता है
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