…मैंने जो देखा, उसने मेरी साँस रोक दी।
मीनाक्षी मेरी तरफ़ पीठ किए बैठी थी, लेकिन उसका सिर थोड़ा झुका हुआ था—और उसकी हथेलियाँ हवा में नहीं, आरव के हाथों पर जमी हुई थीं। वो बहुत धीमी आवाज़ में कुछ बुदबुदा रही थी, जैसे मंत्र पढ़ रही हो। उसके होंठ काँप रहे थे, आँखें बंद थीं। आरव की हालत और भी डरावनी थी—वो जगा हुआ था, आँखें खुली थीं, लेकिन उनकी चमक बुझी हुई, जैसे किसी ने उसकी चेतना पर परदा डाल दिया हो।
मैं सिहर उठी।
मैंने हिम्मत करके फुसफुसाया, “आरव…?”
कोई जवाब नहीं।
मीनाक्षी ने अचानक गर्दन मोड़ी—धीरे, बेहद धीरे—और उसकी नज़र मुझसे मिली। उस पल उसकी आँखों में जो था, वो मानव नहीं लग रहा था। न क्रोध, न खुशी—बस एक ठंडी, नापती हुई स्थिरता।
“जाग गईं?” उसने फुसफुसाकर कहा।
“अच्छा ही हुआ।”
मेरे गले से आवाज़ नहीं निकली।
उसने आरव का हाथ छोड़ा और मेरी ओर सरक आई। तकिया अब भी सीने से चिपका था, जैसे कोई ढाल।
“डरिए मत,” उसने कहा, “मैं उसे छीनने नहीं आई। मैं उसे बचाने आई हूँ।”
“बचाने…?” मैं काँपते हुए बोली।
उसने हल्की हँसी हँसी—पर उस हँसी में अपनापन नहीं, कुछ टूटा हुआ था।
“तुम नहीं जानतीं,” उसने कहा, “आरव बचपन से नींद में चलता है। जब भी उसे बड़ा झटका लगता है—वो खो जाता है। माँ ने मुझे सिखाया था… उसे थामे रखना। बीच में सोना, हाथ पकड़ना… ताकि वो खुद को नुकसान न पहुँचा दे।”
मेरे दिमाग़ में जैसे बिजली कड़की।
“तो फिर आपने पहले क्यों नहीं बताया?”
उसकी आँखें फर्श पर टिक गईं।
“क्योंकि माँ चाहती थीं कि यह बात घर से बाहर न जाए। उन्हें डर था—लोग क्या कहेंगे। और अब… अब शादी हो गई है। आज पहली रात थी। मुझे लगा—अगर आज नहीं रोका, तो…”
वो चुप हो गई।
मैंने आरव की ओर देखा। उसका शरीर अकड़ा हुआ था, माथे पर पसीना। तभी उसके मुँह से टूटी-फूटी आवाज़ निकली—
“पानी…

मैं झपटी, गिलास उठाया। मीनाक्षी ने बिना देखे मेरा रास्ता रोक दिया।
“नहीं,” उसने सख़्ती से कहा। “अभी नहीं। पहले ये…”
उसने तकिए के नीचे से एक छोटा सा काग़ज़ निकाला—पुराना, पीला पड़ा हुआ। उस पर कुछ पंक्तियाँ लिखी थीं।
“ये माँ की लिखी हुई है,” उसने कहा। “जब आरव को दौरे पड़ते थे, तब वो यही पढ़ती थीं।”
मैंने काँपते हाथों से काग़ज़ पकड़ा। शब्द सामान्य थे—कोई तंत्र-मंत्र नहीं, बस एक प्रार्थना। लेकिन पढ़ते ही मेरे भीतर अजीब-सी शांति उतरने लगी।
“पढ़ो,” मीनाक्षी बोली।
मैंने पढ़ना शुरू किया—आवाज़ लड़खड़ा रही थी, पर शब्द निकलते गए। कुछ ही पलों में आरव का शरीर ढीला पड़ा। उसकी साँसें सामान्य होने लगीं। आँखें बंद हो गईं—इस बार नींद में, बेहोशी में नहीं।
कमरे में सन्नाटा छा गया।
मैंने काग़ज़ नीचे रखा।
“तो ये… हर बार होता है?”
मीनाक्षी ने सिर हिलाया।
“बहुत कम। पर आज… आज पहली बार उसे इतना गहरा झटका लगा। शायद तुम्हें लेकर। नई ज़िंदगी, नया डर।”
मैंने उसे देखा—अब वो वही अकेली, थकी हुई औरत लग रही थी, कोई रहस्यमयी साया नहीं।
“लेकिन बीच में सोने की ज़िद… वो तरीका सही नहीं था।”
उसकी आँखों में आँसू भर आए।
“मुझे पता है। पर माँ के जाने के बाद… मैं ही थी। आज डर गई थी। सोचा—अगर उसे कुछ हो गया, तो…”
मेरे भीतर का डर धीरे-धीरे पिघलने लगा, उसकी जगह एक भारी सच्चाई ने ले ली।
“हमें आरव को सब बताना होगा,” मैंने कहा। “और डॉक्टर से मिलना होगा।”
उसने राहत की साँस ली।
“मैं चाहती थी तुम यही कहो।”
सुबह हुई। धूप कमरे में आई। आरव जागा—हैरान, पर सामान्य। हमने उसे सब बताया। वो देर तक चुप रहा, फिर बोला—
“मुझे माफ़ कर दो। मैंने तुम्हें अँधेरे में रखा।”
मैंने उसका हाथ थामा।
“अब नहीं।”
उस दिन के बाद, घर में बहुत कुछ बदला। राज़ राज़ नहीं रहा। इलाज शुरू हुआ। मीनाक्षी ने बीच में सोना छोड़ दिया—लेकिन बीच से हटकर नहीं। वो हमारे साथ थी, खुलकर, ईमानदारी से।
और मेरी सुहागरात?
वो डर से शुरू हुई थी—
पर सच से बच गई।
कभी-कभी जो रात हमें जमा देती है,
वही हमें
एक परिवार की तरह जोड़ देती है।