“अपनी बेटी के लापता होने के आठ साल बाद”

“अपनी बेटी के लापता होने के आठ साल बाद, एक माँ एक आदमी की बाँह पर बने टैटू में उसका चेहरा पहचान लेती है। उस तस्वीर के पीछे की सच्चाई ने उसकी साँसें रोक दीं।”…

जुलाई की शुरुआत की एक शाम, मुंबई के मरीन ड्राइव पर लोगों की भारी भीड़ थी। हँसी, खेलते बच्चों की आवाज़ें और दूर से आती फ़िल्मी संगीत की धुन अरब सागर की लहरों के शोर में घुल रही थीं। लेकिन श्रीमती आशा के लिए यह जगह हमेशा एक ऐसा ज़ख़्म बन गई, जो कभी नहीं भर सका। ठीक आठ साल पहले, यहीं उन्होंने अपनी इकलौती बेटी अनन्या, जो अभी-अभी 10 साल की हुई थी, को खो दिया था।

उस दिन परिवार समुद्र किनारे टहल रहा था। आशा बस एक पल के लिए अपना दुपट्टा सँभालने को मुड़ीं, और उसी क्षण उनकी बेटी भीड़ में कहीं ग़ायब हो गई। पहले उन्हें लगा कि अनन्या पास के बच्चों के साथ खेलने चली गई होगी। लेकिन जब हर जगह ढूँढने, लोगों से पूछने और इंतज़ार करने के बाद भी कोई सुराग नहीं मिला, तो उनके दिल में डर समा गया। तुरंत बीच प्रशासन को सूचना दी गई। लाउडस्पीकर पर घोषणा हुई—पीली सलवार-कमीज़, चोटी में बँधे बाल वाली एक बच्ची—लेकिन सब व्यर्थ रहा।

लाइफ़गार्ड्स ने समुद्र में खोजबीन की, स्थानीय पुलिस भी शामिल हुई, मगर कुछ नहीं मिला। न उसकी चप्पल, न उसकी छोटी-सी गुड़िया। सब कुछ जैसे समुद्री हवा में घुल गया हो।

ख़बर फैल गई—
“मुंबई के समुद्र तट से 10 साल की बच्ची रहस्यमय ढंग से लापता।”

कुछ लोगों ने कहा कि शायद कोई लहर उसे बहा ले गई होगी, लेकिन उस दिन समुद्र शांत था। कुछ ने अपहरण की आशंका जताई, मगर आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों में भी कुछ साफ़ नहीं दिखा।

कई हफ्तों बाद परिवार भारी मन से दिल्ली लौट आया। उसी दिन से आशा की तलाश कभी थमी नहीं। उन्होंने बेटी की तस्वीरों वाले पर्चे छपवाए, दुर्गा माँ के मंदिरों में मन्नतें माँगीं, लापता बच्चों की खोज में लगे सामाजिक संगठनों से मदद ली और अफ़वाहों के सहारे अलग-अलग राज्यों तक जाती रहीं। लेकिन हर उम्मीद टूटती चली गई।

उनके पति रमेश सदमे में बीमार पड़ गए और तीन साल बाद उनका देहांत हो गया। लाजपत नगर के लोग कहते थे कि आशा बहुत मज़बूत हैं—अकेले ही अपनी छोटी-सी मिठाई और बेकरी की दुकान चलाती रहीं, इसी विश्वास के सहारे जीती रहीं कि उनकी बेटी ज़िंदा है। उनके लिए अनन्या कभी मरी नहीं थी।

आठ साल बाद, अप्रैल की एक उमस भरी सुबह, आशा अपनी दुकान के बाहर बैठी थीं कि एक पुरानी जीप आकर रुकी। कुछ युवक पानी और नमकीन लेने अंदर आए। वह ज़्यादा ध्यान नहीं दे रही थीं, तभी उनकी नज़र ठहर गई—उनमें से एक युवक की दाहिनी बाँह पर बना टैटू

डिज़ाइन बहुत साधारण था—गोल चेहरा, चमकती आँखें और चोटी में बँधे बाल। लेकिन उनके लिए वह डरावनी हद तक जाना-पहचाना था। दिल में एक तेज़ चुभन हुई, हाथ काँपने लगे और ठंडे पानी का गिलास गिरते-गिरते बचा।
वह उनकी बेटी अनन्या का चेहरा था।

खुद को रोक न पाते हुए उन्होंने काँपती आवाज़ में पूछा—
— बेटा… ये टैटू… किसका है?

सवाल हवा में लटक गया—सड़क के शोर और ताज़ी बनी मिठाइयों की खुशबू के बीच।

टैटू वाला युवक एकदम स्थिर हो गया। उसने धीरे-धीरे अपनी बाँह नीचे कर ली, जैसे अचानक वह चित्र बहुत भारी हो गया हो। उसने आशा की आँखों में देखा, और एक पल के लिए उसकी सख़्त शक्ल टूट गई। वह तुरंत कुछ नहीं बोला। उसके दोस्त असहज नज़रों से एक-दूसरे को देखने लगे।

— मेरा नाम रोहन है, —उसने आखिरकार कहा—
— ये टैटू… मेरी बहन का है।

आशा को लगा जैसे ज़मीन खिसक गई हो। वह गिरने से बचने के लिए दरवाज़े के चौखट का सहारा लेने लगीं।

— तुम्हारी बहन? —उन्होंने फुसफुसाकर पूछा—
— उसका नाम क्या था?

रोहन ने गहरी साँस ली।

— अनन्या।

इसके बाद जो ख़ामोशी छाई, वह पूर्ण थी।
न गाड़ियों की आवाज़, न लोगों की बातें, न पक्षियों की चहचहाहट—सब जैसे अचानक ग़ायब हो गया हो। आशा को लगा कि उनके पैर जवाब दे रहे हैं। आठ साल की प्रार्थनाएँ, तलाश, बिना सोए गुज़री रातें—सब एक ही शब्द से टकराकर चकनाचूर हो गईं।

— वह… वह कहाँ है? —उन्होंने बहुत धीमी आवाज़ में पूछा।

रोहन ने बैठने की इजाज़त माँगी। आशा उन्हें दुकान के भीतर ले गईं। उन्होंने पानी देने की कोशिश की, लेकिन उनके हाथ इतने काँप रहे थे कि आखिरकार रोहन ने ही जग उठाकर गिलास भर दिया।

रोहन ने धीरे-धीरे बोलना शुरू किया, जैसे किसी पुराने, कभी न भरने वाले ज़ख़्म को खोल रहा हो।

आठ साल पहले, जब वह सत्रह साल का था, वह अपनी माँ के साथ महाराष्ट्र के एक छोटे से कस्बे में रहता था। उसकी माँ कमला घरों में काम करती थीं; गुज़ारा मुश्किल से होता था। एक दिन वह एक छोटी लड़की को घर लाई—लंबी चोटी, डरी हुई आँखें। उसने कहा कि उसे हाईवे के पास अकेली रोते हुए पाया था, और कोई उसे ढूँढता नहीं दिखा।

— मुझे पता था कुछ ठीक नहीं है, —रोहन ने कबूला— लेकिन मैं तब बच्चा था, और माँ ने कहा सवाल मत पूछो।

वक़्त के साथ अनन्या बोलने लगी। उसने टुकड़ों में बातें बताईं—एक समुद्र तट, पीले रंग की पोशाक, एक गुड़िया जो खो गई थी। कमला ने कहा कि वह उसे गोद ले लेंगी। वह उसे कभी पुलिस के पास नहीं ले गईं—डर था कि कहीं बच्ची उनसे छिन न जाए।

— यह सही फ़ैसला नहीं था, —रोहन ने अपराधबोध से भरी आँखों के साथ कहा— लेकिन… उन्होंने उसे प्यार किया। सच में।

अनन्या उसी परिवार का हिस्सा बनकर बड़ी हुई। स्कूल गई, हँसी, गाया। लेकिन हर रात सोने से पहले वह एक ही प्रार्थना सुनने की ज़िद करती—दुर्गा माँ की। कहती थी, उसकी असली माँ भी वही प्रार्थना करती होंगी।

आशा फूट-फूटकर रो पड़ीं। इस बार उन्होंने खुद को रोका नहीं। उन्होंने अपने दिवंगत पति, खोए हुए सालों और उस बेटी के लिए रोया जो उनसे दूर बड़ी हुई थी।

— क्या वह ज़िंदा है? —उन्होंने सिसकियों के बीच पूछा।

रोहन ने सिर हिलाया।

— ज़िंदा है। और बहुत मज़बूत है।

उसे उसने आख़िरी बार दो महीने पहले देखा था। अठारह साल की अनन्या अब एक सामुदायिक क्लिनिक में सहायक के रूप में काम करती थी। कमला का पिछले साल निधन हो गया था और जाने से पहले उन्होंने सब सच बता दिया—कि अनन्या उनकी बेटी नहीं है, कि उसे उन्होंने मुंबई के समुद्र तट पर पाया था, और डर के मारे सच छुपाती रहीं।

— अनन्या बहुत नाराज़ हुई, —रोहन ने कहा— लेकिन उसने उन्हें माफ़ भी कर दिया।

यह सुनते ही आशा समझ गईं कि उनकी बेटी आज भी वही बड़े दिल वाली बच्ची है।

उसी शाम वे साथ-साथ क्लिनिक गए।

रास्ता अंतहीन लगा। आशा अपनी उँगलियों में माला कसकर पकड़े थीं। डर था कि कहीं यह सब एक क्रूर सपना न हो। डर था कि अनन्या उन्हें पहचान न पाए। डर था कि वह उन्हें देखना न चाहे।

जब वे अंदर पहुँचे, काउंटर के पीछे खड़ी एक युवती ने सिर उठाया—काले, चोटी में बँधे बाल। रोहन को देखकर उसकी आँखें चमक उठीं।

— तुम यहाँ? —वह मुस्कुराई।

फिर उसकी नज़र आशा पर पड़ी।

समय थम गया।

आशा कुछ न बोल सकीं। बस एक क़दम आगे बढ़ाया। अनन्या ने उन्हें ध्यान से देखा—काँपते हाथ, आँसुओं से भरी आँखें, वर्षों से थका हुआ चेहरा। जैसे भीतर कहीं कुछ बहुत पुराना जाग उठा हो।

— माँ? —वह अनायास ही बोल पड़ी।

आशा ने सीने पर हाथ रखा और घुटनों के बल बैठ गईं।

किसी सबूत, किसी काग़ज़, किसी लंबी सफ़ाई की ज़रूरत नहीं पड़ी। वे ऐसे गले मिलीं, जैसे शरीर को वह याद हो जो दिमाग़ भूल चुका था। वे साथ रोईं, साथ हँसीं, साथ काँपीं।

घंटों बातें होती रहीं। अनन्या ने अपनी ज़िंदगी सुनाई। आशा ने अपनी। रमेशमिठाई की दुकानलाजपत नगर, तलाशें, रात-रात भर की प्रार्थनाएँ—सब साझा हुआ।

अनन्या ने अपने बैग से एक छोटा, घिसा-पिटा सामान निकाला—कपड़े की गुड़िया

— यह मुझे सालों बाद मिली, —उसने कहा— मैं हमेशा जानती थी कि मेरी ज़िंदगी इससे पहले भी कुछ और थी।

अगले दिन काग़ज़ी काम हुए, डीएनए जाँच हुई—जिसने वही साबित किया जो दिल पहले ही जानता था। ख़बर मोहल्ले तक पहुँची, पुराने जान-पहचान वालों तक, लापता बच्चों की तलाश में जुटे संगठनों तक। यह त्रासदी नहीं, चमत्कार थी।

अनन्या ने दिल्ली में अपनी माँ के साथ रहने का फ़ैसला किया—मजबूरी से नहीं, अपनी इच्छा से।

मिठाई की दुकान फिर हँसी से भर गई। अनन्या ने काजू कतली, गुलाब जामुन और त्योहारों की मिठाइयाँ बनाना सीखा। आशा ने नया मोबाइल चलाना, ताकि बेटी देर से निकले तो संदेश भेज सकें।

रोहन आता-जाता रहा। वह परिवार का हिस्सा बन गया। उसकी बाँह का टैटू अब दर्द नहीं देता था—अब वह प्यार का निशान था, खोने का नहीं।

एक साल बाद, माँ-बेटी साथ मुंबई के मरीन ड्राइव लौटीं। हाथ में हाथ डाले चलती रहीं। समुद्र में सफ़ेद फूल अर्पित किए—विदाई के लिए नहीं, बल्कि एक अध्याय के पूर्ण होने के लिए।

— अब मुझे डर नहीं लगता, —अनन्या ने कहा— अब मुझे पता है मैं कौन हूँ।

आशा मुस्कुराईं। आठ साल की अँधेरी रातें प्यार को हरा नहीं सकीं।

क्योंकि कभी-कभी, सबसे लंबी जुदाई के बाद भी, ज़िंदगी वही लौटा देती है—जो कभी खोना नहीं चाहिए था।

और इस बार, हमेशा के लिए।