गर्मी में तलाब के किनारे पेड़ का गांव/hi – News

गर्मी में तलाब के किनारे पेड़ का गांव/hi

गर्मी में तलाब के किनारे पेड़ का गांव/hi

गर्मी में तालाब के किनारे पेड़ का गांव। यह क्या घर में तो पानी ही नहीं है। अब मैं खाना कैसे बनाऊंगी? तुम खाना बनाने के लिए कह रही हो। अरे मैं तो सुबह से नहाई भी नहीं हूं। यह सोनम और शीला कब से बाल्टी लेकर गए हुए हैं। कुएं पर पानी भरने के लिए लेकिन अभी तक आई नहीं है। गर्मी ही इतनी है कि कुएं पर 24 घंटे औरतों की भीड़ लगी होती है। पानी भरने के लिए जरूर उसी भीड़ में फंसी होंगी। तारा, मेघा और तनवी तीनों सोनम और शीला के आने का इंतजार करती हैं। थोड़ी देर में सोनम और शीला पानी की आधी-आधी बाल्टी भरकर घर आती हैं। जिसे देख तुम दोनों 2 घंटे की

निकली हुई हो और इतनी देर में सिर्फ आधी-आधी पानी की बाल्टी भरकर लेकर आई हो। अरे इसमें हम पिएंगे या फिर खाना बनाएंगे और घर का काम कैसे करेंगे हम? वैसे भी अभी तक कोई नहाया भी नहीं है। हमारी बात का यकीन नहीं होता है ना तो कुएं पर जाकर देख लो। अरे कई-कई औरतों को तो पानी ही नहीं मिला। हम तो बड़ी मुश्किल से ये बाल्टी का पानी भर कर लेकर आई हैं। और नहीं तो क्या गर्मी से सबका ही बुरा हाल है। गांव में पानी की तो इतनी किल्लत है कि पूछो मत। इसका मतलब मैं आज भी नहीं नहा पाऊंगी। ना जाने ये पानी का टैंकर वाला भी कब आएगा। दो दिन हो गए इसे

आए हुए। शायद कल आ जाए। कल सुबह हम सबको जल्दी उठना पड़ेगा। तभी टैंकर वाले से पानी भर पाएंगे। अगली सुबह 4:00 बजे ही सभी बहुएं उठकर मटके बाल्टी लेकर टैंकर के आने का इंतजार करते हैं। और गांव में जैसे ही पानी का टैंकर आता है तो सभी बहुएं पानी लेने लगती हैं। लेकिन कुछ ही सेकंड्स में गांव की औरतों की पानी की टैंकर के पास इतनी बड़ी भीड़ लग जाती है कि किसी बहू का ठीक से मटका नहीं भरता तो किसी की बाल्टी। जब से यह गर्मी का मौसम शुरू हुआ है तब से एक-एक बूंद को तरस गए हैं हम पानी की। आखिरकार कब तक इस पानी की किल्लत रहेगी? पूरे गांव में कुएं का पानी भी आधे

से ज्यादा कम हो गया है और ना ही हमारे गांव में कोई तालाब नदी है। इस गर्मी के मौसम में गर्मी नहीं हम गरीब लोगों की मौत आती है मौत। सभी बहुएं उदास होकर घर जाती हैं और उस थोड़े पानी को ही बचाकर अपना गुजारा चलाती है। गर्मी के चलते गांव में सभी का बुरा हाल था। कहीं कोई पानी के लिए तरस रहा था, तो कोई गर्मी से ही परेशान था। रात में भी गर्मी से सब परेशान है। कब खत्म होगा यह गर्मी का मौसम? अभी तो तीन-चार महीने पड़े हैं भैया। जब तक तो ऐसे ही गुजारा करना होगा। मुझे तो लगता था कि आंगन में बैठकर खाना खाएंगे तो बाहर थोड़ी ठंडी-ठंडी हवा चलेगी। लेकिन यहां तो

रात में भी लू जैसी हवा चल रही है। इतनी गर्मी में तो ठीक से सोया भी नहीं जाता है। अरे पूरे गांव में सभी का यही हाल है। गर्मी से हर कोई परेशान है। किसी के चेहरे पर मुस्कान देखने को नहीं मिलेगी। जैसे-जैसे दिन गुजरते हैं, वैसे-वैसे गर्मी का मौसम भी काफी ज्यादा बढ़ने लगता है। ऐसे ही एक दिन। एक तो बाहर इतनी धूप हो रही है। ऊपर से खाना बनाने के लिए लकड़ियां भी खत्म हो गई हैं। अब इतनी कड़ी धूप में जाकर जंगल से लकड़ियां लेकर आओ। कहां इतनी धूप में अकेली जाओगी? चलो मैं भी तुम्हारे साथ चलती हूं। दोनों बहुएं धूप से बचने के लिए

सिर पर गीला कपड़ा बांध लेती हैं और अब नजदीकी जंगल में लकड़ियां लेने के लिए जाती हैं। दोनों बहुएं जंगल से लकड़ियां चुन ही रही थी कि तभी उन्हें वहां एक छोटा सा खरगोश दिखता है। मेघा देखो ना कितना प्यारा छोटा सा खरगोश है। क्यों ना हम इसे अपने साथ ले जाएं। पता है मुझे बचपन से खरगोश पालने का बड़ा शौक रहा है। बाकी लोगों को भी खरगोश काफी ज्यादा पसंद आएगा। चलो इसे पकड़ते हैं। मेघा और तारा जैसे ही उस खरगोश को पकड़ने के लिए उसके करीब जाती है कि तभी वह खरगोश इधर-उधर भागने लगता है। जिसके चलते तारा और मेघा को भी उस खरगोश के पीछे भागना पड़ता है। उस खरगोश

का पीछा करते-करते तारा मेघा जंगल में थोड़ा आगे निकल जाती हैं। लगता है हम जंगल के अंदर कुछ ज्यादा ही आ गए हैं। अब क्या करें? तुम्हें रास्ता पता है हम कहां से आए थे? मुझे नहीं पता तारा इस खरगोश के चक्कर में मैंने तो रास्ता ही नहीं देखा ठीक से। तारा मेघा जैसे ही थोड़ा सा आगे बढ़ती है तो उन्हें उस जंगल के पास ही एक बहुत बड़ा तालाब दिखता है जिसे देख दोनों काफी हैरान हो जाती हैं। मुझे तो लगता था कि हमारे गांव में कोई तालाब नदी नहीं है। लेकिन यहां जंगल के पास कितना बड़ा तालाब है और इसका पानी भी कितना साफ है। यहां गर्मी भी नहीं लग रही है। पेड़ और तालाब

होने की वजह से। यहां कितनी ज्यादा ठंडक भी है। काश हमारा घर भी यहीं होता तो कितना अच्छा होता ना। ना पानी की टेंशन होती है और ना गर्मी से परेशान होते हैं। तो क्यों ना हम लोग अपना घर यहीं बना लें। लेकिन मेघा यह होगा कैसे? यहां घर बनाना इतना भी आसान नहीं है। और इस तालाब किनारे इतनी जगह भी नहीं है कि हम घर बना सकें। लगता है तारा तुमने यहां के आसपास के पेड़ों को नहीं देखा। यहां के पेड़ काफी ज्यादा बड़े और चौड़े हैं। अगर हम चाहे तो इन पेड़ों के अंदर अपना घर बना सकते हैं। लेकिन हम भला इन पेड़ों के अंदर कैसे रह सकते हैं? घर बना भी लिया तो पेड़ों के

अंदर रहना मुमकिन नहीं है। क्यों नहीं मुमकिन है तारा? यह पेड़ इतने बड़े हैं कि इनके अंदर दो लोग आराम से रह सकते हैं। हमें बस पांच पेड़ के अंदर घर बनाने होंगे। फिर इनके अंदर हम अपने पतियों के साथ आराम से रह सकते हैं। और यहां तो तालाब भी है तो हमें पानी को लेकर भी ज्यादा टेंशन नहीं होगी। तुम्हारी बात में दम तो है। चलो चलकर बाकी लोगों को भी बताते हैं। दोनों बहुएं जैसे तैसे कर उस जंगल से बाहर आती हैं और घर आकर सारी बात बाकी लोगों और अपने पतियों को बताती हैं। और जब वह सब तालाब के किनारे आकर वहां का नजारा देखते हैं तो उन्हें भी काफी अच्छा

लगता है। अरे यह जगह तो सच में काफी सुंदर और ठंडक भरी है। तुम लोगों ने सही कहा था। हमें यहां रहने में कोई दिक्कत नहीं होगी। इन पेड़ों के अंदर घर बनाना भी इतना ज्यादा मुश्किल नहीं है। चलो फिर काम पर लगते हैं। अब सभी पति कुल्हाड़ी की मदद से उन बड़े-बड़े पेड़ों के अंदर छेद करने लगते हैं। तो वहीं उनकी पत्नियां भी इसमें उनकी काफी मदद करती। पेड़ अच्छे से छेद कर सारे छोटे-मोटे लकड़ी के टुकड़े बहुएं हटाकर लकड़ी पेड़ के अंदर चादर और अपना छोटा-मोटा जरूरत का सामान रख लेती हैं। और अब पांचों बहुओं के पास उनका खुद का तालाब

किनारे पेड़ घर होता है। तालाब किनारे रहने की वजह से उनके पानी के काम भी आसानी से हो जाते हैं। कितने समय के बाद मुझे सुकून की नींद आई है। मैं तो आराम से सो रही थी रात में। कपड़े बर्तन धोने में भी कितनी दिक्कत होती थी। लेकिन देखो अब हम हाथों हाथ अपने सारे काम कर सकते हैं। अब जल्दी से काम करते हैं। तालाब में जाकर नहाएंगे भी। पांचों बहुएं जल्दी से अपने छोटे-मोटे काम निपटा लेती है और तालाब के ठंडे पानी के अंदर जाकर काफी ज्यादा मस्ती करती है और ऐसे ही कुछ दिन गुजर जाते हैं। तारा और सोनम जंगल से निकलकर गांव में राशन के लिए जाती हैं। तभी वहां उन्हें

गांव में रहने वाली उनकी पड़ोसन शांति मिलती है। अरे शांति कैसी हो तुम? और यह क्या इतनी परेशान क्यों? कुछ हुआ है क्या? तुम लोग तो जानती हो कि गांव में कितनी ज्यादा गर्मी पड़ रही हो। पानी को लेकर भी कितनी किल्लत रहती है। मेरी और मां जी की तबीयत गर्मी के चलते काफी ज्यादा खराब है। डॉक्टर कह रहे हैं अगर ऐसा ही रहा तो उन्हें शांति ऐसा मत करो। उन्हें कुछ नहीं होगा। हमारे पास एक ऐसी जगह है जहां काफी ज्यादा ठंडक है और पानी की कोई परेशानी भी नहीं है। तुम सच कह रही हो। सच में कोई ऐसी जगह है मुझे वहां ले चलो ना। सोनम और

तारा शांति को उसी तालाब किनारे वाली जगह में ले जाते हैं। शांति जब वहां का ठंडा माहौल तालाब और पांचों बहू का पेड़ के घर के अंदर देखती हैं तो वह काफी ज्यादा खुश होती हैं। इन पांचों बहुओं ने तो गर्मी से छुटकारा पा लिया था। लेकिन गांव में कई ऐसे परिवार थे जो अभी गर्मी से जूझ रहे थे। जिसके चलते सभी बहुएं अब गांव वालों को अपनी जगह के बारे में बताती हैं और अब गांव के लोग और सरपंच उस तालाब किनारे आते हैं। अरे तुम लोगों ने तो काफी अच्छी जगह ढूंढ निकाली है। मैं इतने सालों से इस गांव में रह रहा हूं और मुझे इस जगह के बारे में कुछ भी नहीं पता लेकिन हम सब एक

साथ यहां घर बनाकर रह सकते हैं। हम इतने सारे लोग हैं और यहां घर बनाने लायक पेड़ काफी कम है। जरूरी नहीं है कि पेड़ों के अंदर ही रहें। कुछ लोग पेड़ों के अंदर रहेंगे तो कुछ लोग पेड़ों के ऊपर घर बना लेंगे। पांचों बहू के चलते अब पूरे गांव वालों को भी जल्द ही गर्मी से छुटकारा मिलने वाला था। अगले दिन से ही सभी गांव के लोग पेड़ों के अंदर और पेड़ों के ऊपर घर बनाना शुरू कर देते हैं। जिसमें बहुएं और उनके पति भी काफी मदद करते हैं। तो वहीं तारा सबके लिए इस गर्मी के मौसम में ठंडा-ठंडा आम पन्ना बनाकर लाती है। अब आप बस थोड़ा आराम कर लीजिए और यह ठंडा-ठंडा

आम पन्ना पीजिए। एक से दो हफ्ते के अंदर ही उस तालाब किनारे उन पेड़ों पर पूरा गांव आकर बस जाता है। जिसके चलते अब सभी गांव वालों को उन पांच बहू के चलते आखिरकार पूरी तरह गर्मी से छुटकारा मिल चुका था। मानना पड़ेगा तुम पांचों के चलते ही आज हम सभी गांव वालों को गर्मी से छुटकारा मिल ही गया। और नहीं तो क्या अब हम इस गर्मी के मौसम में भी आराम से खुलकर रह सकते हैं। चैन की नींद सो सकते हैं। और सबसे जरूरी चीज अब तो हमें पानी की भी कोई दिक्कत नहीं होगी। और यहीं थोड़ी दूर पर एक झरना भी है। अगर कभी तालाब का पानी खत्म भी होने को आया तो झरने का पानी तो है ही।

गांव का एक-एक इंसान उन पांचों बहू को शुक्रिया बोलता है। और अब पूरा गांव उस तालाब किनारे उन पेड़ों के अंदर हंसी-खुशी रहता है। सरिता दीदी ये देखो मैंने इस मिट्टी से कितनी मजबूत टिकाऊ हानि बनाई है। इसमें हमारे पूरे परिवार के लिए फैल से दाल चावल पक जाएगा। जरा मेरा जुगाड़ देखो। मैंने खजूर की झाड़ू बनाई है। आशा कंचन कितना कड़ा घाम है। छत की घास लग गई हो तो मचान से नीचे उतर आओ। मां हमने सारी जगह घास बिछा दी है। तपतपाती गर्मी जमुना और उसकी पांचों बहू घास का घर, मिट्टी के बर्तन, हाथ, पंखा, चटाई, जुगाड़ू चीज बना रही थी जिसे देखकर पड़ोस

ने। बहू हो तो ऐसी ही कौशल्या बहन इतनी गरीबी में गुजारा करके रह गई और कितना फर्स्ट क्लास का घास-फूस से घर बना लिया। सही कह रही हो सरस्वती बहना आजकल के टाइम तो घर तोड़ने वाली बहू का जमाना है। भैया एक इस जमुना का नसीब कितना अच्छा इतना दुख गरीबी भुखमरी झेलकर भी पांचों बहुएं इसके पांव धोकर पीने को तैयार है। दोनों पड़ोसन जमुना के जुगाड़ू बहू की तारीफ करने के साथ जल भी रही थी। जहां मोहल्ले में सबने तीन-चार मंजिल वाला मकान बनवा रखा था। यह पांचों घास का घर क्यों बना रही थी? सारा किस्सा क्या है? आइए, पिछली कहानी में देखते हैं। जहां दोपहर के टाइम मकान की छत

तपतपा रही थी। पांचों बहुएं उनके बाल बच्चे और सास पसीने से परेशान थे। हे भगवान इस गर्मी ने तो तबाह करके रख दिया है। सच में आज तो भयंकर वाली गर्मी है। घर भी भट्टी जितना तप रहा है। तभी एकदम से बिजली कट जाती है। हे भगवान जी, एक तो गर्मी आग बरसा रही। ऊपर से कर्मचली बिजली वाले दोपहर में लाइट काट लेते हैं। लाइट गए दो-चार मिनट गुजरते ही गंगा की हालत खराब होने लगती है। मां जी। मुझे बहुत ही बेचैनी सी हो रही है। जी भी मचल रहा है। गंगा बहू तुझे छठवां महीना चढ़ गया है। घर में घमस ज्यादा है। चलो बहुओं आंगन में चलकर बैठते हैं। दादी दादी मैं भी चलूंगा।

मैं भी चलूंगी दादी। हां हां मेरे प्यारे पोते पोती। चलो। पसीनेपसीने होकर सब आंगन में छांव देखकर बैठ जाते हैं। आंगन में थोड़ी राहत है। वरना घर के भीतर तो दिन रात भबका छाया रहता है। मां जी कुछ तो घर के अंदर गर्माहट इसलिए भी भरी रहती है क्योंकि एक ही कमरे के अंदर पूरे परिवार का पकाना खाना सोना सब कुछ होता है। इसीलिए गर्मी पास नहीं हो पाती। अगर हमारे पास भी दो कमरे होते तो एक में रसोई घर होता। एक में सोते तो ठंडक रहती। बहू तुम पांचों के पतियों की कमाई धमाई भी तो इतनी नहीं है। किसी तरह कमाते खाते जीवन गुजर रहा है। तेरे ससुर जी अगर भरी जवानी में

नहीं गुजरे होते तो आज हमारी दशा इतनी गरीबी भरी नहीं होती। उनकी बड़ी इच्छा थी कि जब बहुएं शादी करके आएंगी तो सबके लिए अलग-अलग कमरा, टॉयलेट, बाथरूम सब बनवाऊंगा। यह एक कमरा तैयार करवाया था। पता नहीं किसकी हाय लग गई उन्हें। कहते-कते जमुना फूट-फूट कर रोने लगती है। तभी पांचों भाई आ जाते हैं। मां बच्चों आप सब बाहर क्यों बैठे हैं? अजी घर के अंदर लाइट नहीं है तो क्या करें? सब लोग अंदर चलिए। अड़ोसे पड़ोसी सब लोग देख रहे हैं। ऐसे अच्छा थोड़ी लगता है। अरे सोहन तू क्यों खिसिया रहा है? अपने आंगन में बैठकर हवा ही तो खा रहे हैं। तभी पड़ोसन सरस्वती

अपने मंजिल वाले मकान से मजाक उड़ाती है। हां हां तुम लोग ये गरम-गरम लू खा सकते हो। एसी कूलर खरीदने की तो औकात नहीं है। थर्ड क्लास चीप लोग पड़ोसन के मजाक उड़ाने पर जमुना झगड़ जाती है। अरे ओ सरस्वती चार मंजिल वाला मकान बना लिया तो ज्यादा खुद पर ऐट मत। इंसान को अर्श से फर्श पर आने में टाइम नहीं लगता है। मां क्यों झगड़ा कर रही हैं? चलिए भीतर सब लोग। सब घर के भीतर आकर बैठ जाते हैं। अरे अब क्या मुहूर्त निकलवाना पड़ेगा खाना मांगने के लिए। भूख से जान निकल रही है। खाना दे दो। हां जी बस निकालती हूं। एक कमरे के चलते सबको खाने सोनेपीने में दिक्कत परेशानी का

सामना करना। तभी मोहन एक टुक रोटी तोड़कर खाते ही उगल देता है। ठू अरे यह रोटी किसने बनाई है? पूरी की पूरी किन-किन सी लग रही है? आटा सानने से पहले छान लिया करो। मोहन जी मैंने आटा अच्छे से छालकर रोटी बनाई थी। दिन रात तो छत से मिट्टी गिरती रहती है। हम भी कितना ध्यान दें? अरे तो जरूरी है उसी कोने में खाना पकाना। दूसरे कोने में रसोई बना लो। एक तो हम पांचों मर्दाने इतनी कड़ी धूप में बाहर कमाने जाते हैं और साफ सुथरी रोटी भी खाने को नहीं मिलती। हां, जैसे हम बहुएं तो घर में रहकर झक मारती है। आप पांचों भाई हमें केवल राशन पानी लाकर देते

हैं। इतनी चिलचिलाती गर्मी में चूल्हे पर एक दिन खाना पका कर देखिए। ना तो एक पक्का मकान है, ना रसोई है, ना घर में ढंग के चार बर्तन है। अरे हमको आप पांचों भाई पेट में खिलाने के अलावा क्या सुख दे रहे हैं? बताइए। बहू बेटों के बीच में लड़ाई झगड़ा होते देखकर जमुना परेशान हो जाती है। हे भगवान इन लुगाई मर्दों के रोज-रोज के झगड़े से मेरा तो माथा फटक गया है। पड़ोसी मुंह बाए हुए हैं। झगड़ा सुनने के लिए शांति बनाकर रखो। थोड़ी और सोहन मोहन इस मकान को बने 30 साल से ऊपर हो गया है। इसको मरम्मत की जरूरत है। मां हमने सरकारी आवासीय योजना में फॉर्म भरा हुआ है। सरकार

की तरफ से हमें घर और शौचालय बनाने के लिए पूरे ₹50,00 मिलेंगे। बस थोड़े दिन का दुख किसी तरह से और उठा लो। बस एक बार ठप्पा लग जाए पेपर पर। अजी यह सरकार तो हर साल ऐसा झांसा देती है। लेकिन इस सरकार के झूठे वादे निकलते हैं। आप पांचों भाई अपनी मेहनत की कमाई से एक-एक कमरे भी बनाएंगे तो चारप कमरे बन जाएंगे। कल को हम सबके बाल बच्चे होंगे तो एक कमरे में थोड़ी गुजारा होगा। हां, पैसे तो जैसे पेड़ पर उगते हैं। खाली तोड़ कर लाना है। अरे हम जंगल से काट कर लकड़ी बेचकर खानेपीने का खर्चा चला रहे हैं। वही बड़ी बात है। प्रमोद जी, देवर जी आप सब भाई उस मुंशी को

कारखाने में काम क्यों नहीं कर लेते? कम से कम महीने के आखिर में हाथ में तनख्वाह आएगी तो पूरे महीने हमें घर चलाने में दिक्कत परेशानी नहीं होगी और घर चलाकर भी हम कुछ पैसे बचाकर घर में जरूरत की चीज बर्तन पंखा फ्रिज वगैरह खरीद लेंगी। सरिता भाभी हम पांचों भाई कोई हाथ पर हाथ धर कर बैठे नहीं है। हम गए थे उसके पास काम पता करने के लिए। लेकिन वो मुंशी बहुत बेईमान आदमी है। मजदूर से काम करवा लेता है लेकिन महीने के आखिरी में दिहाड़ी मार जाता है। इसलिए लकड़ी बेच रहे हैं। और इस गांव देहात में नदी जंगल के अलावा कुछ नहीं है।

अभी तो गर्मी से नदी में मछलियां भी नहीं पड़ रही। बरसात में मछली आएंगी तो वही बेचेंगे। इसी तरह गर्मी में गरीब परिवार का दिन गुजर रहा था। रोजाना की दिनचर्या की तरह अगले दिन पांचों ईंधन के लिए सूखी लकड़ी पत्ते लेने जंगल आती हैं। आज तो सड़क अंगारे जितनी सुलग रही है ना। हां जीजी लेकिन देखो इस जंगल की घास कितनी ठंडक भरी है। बिछौने की भी जरूरत नहीं। इंसान ऐसे ही चैन से सो जाएगा। हमारा घर है दिन रात कितना तपता। तभी रीता की नजर जंगल में दूरदराज तक उगी घास पर जाती है जिससे उसे जुगाड़ आता है। मेरे दिमाग में एक बड़ा ही धांसू जुगाड़ आया है। जिससे हम

चार-प कमरे बना सकते हैं। किसी के ₹1 खर्चे बिना। मगर वो कैसे? इस घास से यहां कितनी घासें पुराने जमाने के लोग घास मिट्टी की मढ़ई बनाकर रहते थे और हमारे मकान का कोई भरोसा नहीं कब टूट जाए। हर दीवार में दरार आ गई है। पांचों ताबड़तोड़ गर्मी में घास मिट्टी लकड़ी काटने में भिड़ जाती है और चलचिलाती गर्मी में ही घर आकर काम चालू कर देती हैं। मैंने घड़ी मिट्टी से दीवार लिपती हूं। फिर तुम घास चिपकाती जाना। बहुओं तुम इतनी कड़क धूप में दीवार क्यों लिपाई पुताई कर रही हो? आज इतवार थोड़ी ना है। मां जी, हम पांचों घास से घर बनाने का जुगाड़ आजमा रही हैं।

फिर हम ठंडक में सोएंगे चैन सुकून से। अच्छा तो मैं भी तुम्हारी मदद करवाती हूं। लाओ मैं मचान बनाती हूं। घास दे दो। पांचों का पहला दिन घास की दीवार बनाने में गुजर जाता है। दो बहुएं घास के बोझें जंगल से लाती है और बाकी की दीवार बनाती हैं। क्या बात है? आज तो घर में बगैर पंखा चले बर्फ जितनी ठंडक है। क्योंकि मां और चाची ने जुगाड़ लगाया है चाचू। तभी तो घर ठंडा-ठंडा कूल-कूल है। अगले दिन पांचों नए सिरे से काम करती हैं। इस बार वो सब जंगल के अलग भूभाग में जाती हैं। देखो यहां तो खजूर ही खजूर के पेड़ हैं और कितने पत्ते भी झड़े हैं। तुम्हें पता है हमारे गांव

में कभी कोई झाड़ू खरीदता नहीं था। खजूर की टहनियों से ही झाड़ू बनाकर इस्तेमाल होते थे। कंचन की इस बात पर आशा का जुगाड़ू दिमाग चल पड़ता है। तो फिर यह डालियां ले चलते हैं। इससे अपने इस्तेमाल के लिए भी झाड़ू बना लेंगे और बाकी का झाड़ू बनाकर हम बेच भी सकते हैं। इसे कहते हैं आम के आम गुठलियों के भी दाम। इसी तरह पांचों जंगल का सदुपयोग करके घास से घर, पेड़ों के पत्ते से झाड़ू, पंखे चटाई बहुत कुछ बनाती है। तभी पानी पीते नंदू का मुंह कट जाता है। आ मां मेरा मुंह कट गया। नंदू कितनी बार कहा है इस वाले गिलास से पानी मत पिया करो। यह टूटा हुआ है। घर में एक

गिलास भी नहीं बचा है और इतने पैसे हैं नहीं कि टूटे फूटे बर्तन बदलकर नया खरीद लें। मगर टूटे बर्तन घर में पनौती होते हैं। इससे बरकत नहीं आती। क्यों ना हम मिट्टी के बर्तन बना लें। मिट्टी के बर्तन गर्मी में ठंडे रहते हैं। हमारा खाना भी बर्बाद नहीं होगा। अनाज की भी बचत होगी। रीता का मिट्टी से बर्तन बनाने का उपाय सबको पसंद आता है। वो हांडी, भगोना, कढ़ाई सब कुछ बनाती है। इसके बाद वह रसोई घर भी बनाती है। अब बारी टॉयलेट बनाने की थी जिसमें पांचों के पति एड़ी चोटी का जोर लगा देते हैं। आंगन में इतना गहरा गड्ढा खोद दिया लेकिन निकासी की होद ही नहीं

बनेगी तो टॉयलेट सीट बिठाने का फायदा ही नहीं है क्योंकि इतनी लंबी पाइप महंगी आएगी काफी तभी कंचन कड़कड़ाती धूप में मोटा तना वाला बांस काट कर ले आती है इससे पाइप का जुगाड़ हो जाएगा यह बांस का सरकंडा पाइप के आकार का है और रही बात टॉयलेट सीट बिाने की तो हम पत्थर का इस्तेमाल करेंगे इसके लिए अब पांचों सड़कों से काफी पत्थर चुनकर ले आती हैं जिससे टॉयलेट भी बन जाता है और इसी प्रकार वो घास लकड़ी की मदद से पांच अलग-अलग कमरे बड़ी सी रसोई सब तैयार कर देती हैं। हमने मिलजुलकर अपना पांच कमरे वाला ससुराल तैयार कर लिया। अब हमें गर्मी में बिच्छम

बिच्छे में नहीं सोना पड़ेगा। बाहू यह तो तुम्हारी मेहनत का फल है जो आज एक कमरे से तुम्हें पांच कमरा कर लिया। पांच कमरे वाला ससुराल रसोई टॉयलेट बनाने की खुशी में पांचों जुगाड़ू बहुएं सबके लिए खीर पूरी आम पन्ना बनाती

Disclaimer: This story is fictional and created for entertainment purposes only. Any names, characters, places, or events are fictitious or used fictitiously. No real person or organization is intended to be portrayed.

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