हाथों में लिस्ट लिए एसपी वैशाली सिंह अपनी बहन तारा की शादी की साड़ी खरीदने अकेले बाजार जा रही थी। उसने प्रिंटेड गुलाबी कुर्ता सेट, पैरों में साधारण जूते, चेहरे पर सादगी, ना कोई बॉडीगार्ड, बस एक आम बहन की तरह बाजार पहुंची। उसे देख आसपास के दुकानदार पहचान भी ना पाए कि कौन आई है। तभी उनकी नजर सीधे उसी पुरानी कपड़ों की दुकान पर गई, जहां वह पहले भी कई बार बिना सिक्योरिटी चोरी छिपे आ चुकी थी। एसपी वैशाली धीरे-धीरे दुकान में दाखिल हुई। दुकान बड़ी नहीं थी, लेकिन चारों तरफ रंग बिरंगी साड़ियों के थान सजे थे। काउंटर पर मालिक हिसाब किताब में उलझा

था और करीब 20 साल का एक लड़का ग्राहकों को साड़ियां दिखा रहा था। वैशाली को आते देख किसी ने खास ध्यान नहीं दिया। सबको लगा कोई आम सी ग्राहक होगी। वह काउंटर के पास जाकर खड़ी हो गई और लड़के से बोली, भैया मेरी बहन की शादी है। उसके लिए एक बहुत अच्छी साड़ी चाहिए। कुछ बढ़िया डिजाइन दिखाएं। लड़के ने बेमन से कुछ साड़ियां काउंटर पर फैला दी। वैशाली एक-एक साड़ी को उठाकर गौर से देखने लगी। उसे कभी रंग पसंद नहीं आता तो कभी बॉर्डर नहीं। उन्होंने एक साड़ी को देखकर कहा, “यह रंग बहुत हल्का है। तारा पर खिलेगा नहीं। इसका बॉर्डर बहुत पतला है। शादी के हिसाब से

जचेगा नहीं। फिर वैशाली ने एक और साड़ी को पलट कर कहा, अरे यह तो बहुत ज्यादा छटक है। दुल्हन को थोड़ा सोबर दिखना चाहिए। इसी तरह आधा घंटा कब बीत गया पता ही नहीं चला। दुकान में ग्राहकों की भीड़ बढ़ने लगी थी। लड़के के चेहरे पर अब झुंझुलाहट साफ झलक रही थी। उधर नंद किशोर साहू भी अपनी मोटी ऐनक के पीछे से बार-बार वैशाली को घूर रहा था। फिर वह थोड़ा रूखेपन से बोला, सब एक से बढ़कर एक पीस हैं मैडम जी। इनमें से ही कोई ले लीजिए। लेकिन वैशाली का दिल मान ही नहीं रहा था। उनके लिए यह सिर्फ एक साड़ी नहीं थी। यह उनकी बहन के लिए उनका प्यार उनका दुलार था। उन्होंने

शांत स्वर में जवाब दिया। मुझे कोई जल्दी नहीं है भाई साहब। मेरी बहन की शादी का मामला है। सबसे अच्छा ही चाहिए। तो नंद किशोर साहू ने धीरे से लड़के को इशारा किया। लड़का बड़बड़ाता हुआ तहखाने की ओर गया और कुछ ही देर में नए बंडल उठाकर ले आया और काउंटर पर रख दिया। अब काउंटर साड़ियों से भर चुका था। वैशाली एक-एक साड़ी खुलवा कर देख रही थी और नंद किशोर साहू का पारा चढ़ता जा रहा था। लड़का धीरे से अपने मालिक के कान में फुसफुसाया। आधे घंटे से दिमाग खराब कर रखा है। एक साड़ी तो पसंद आ नहीं रही। वैशाली ने उसकी बात सुन ली। एक पल को उन्हें बुरा लगा। वह

चाहे तो एक मिनट में इस दुकान पर ताला लगवा सकती थी। लेकिन आज वह अपनी पावर का इस्तेमाल नहीं करना चाहती थी। उन्होंने लड़के की बात को अनसुना कर दिया और फिर लगभग 1 घंटे की माथा पेची के बाद उनकी नजर उस पर पड़ी। एक गहरे मरून रंग की साड़ी जिस पर सोने के धागों से चौड़ा बॉर्डर बना था और पूरी साड़ी पर महीन कढ़ाई का काम था। वह साड़ी जैसे तारा के लिए ही बनी थी। वैशाली के चेहरे पर आखिरकार एक संतुष्टि की मुस्कान आ गई और उन्होंने साड़ी हाथ में लेते हुए कहा, “हां बस यही चाहिए। इसे पैक कर दो।” नंद किशोर साहू ने राहत की सांस ली। जैसे कोई बड़ी मुसीबत टल गई हो।

लड़के ने जल्दी-जल्दी साड़ी को तह करके एक चमकीले पैकेट में डाल दिया। वैशाली ने पर्स से पैसे निकाल कर दिए और पैकेट हाथ में ले लिया। उसके मन में एक खुशी थी, एक सुकून था कि उन्होंने अपनी बहन के लिए सबसे अच्छी चीज चुन ली है। वह दुकान से बाहर निकलने के लिए मुड़ी ही थी कि उनकी नजर पैकेट के एक कोने से झांकते एक धागे पर पड़ी जो कुछ गड़बड़ थी। वह रुकी पैकेट को खोला और साड़ी को दोबारा बाहर निकाला। उनके दिल की धड़कन बढ़ गई। साड़ी के बॉर्डर पर एक जगह से धागा टूटा हुआ था और उधड़ कर लटक रहा था। उन्होंने हल्के से उसे खींचा तो कढ़ाई की पूरी सिलाई खुलने

लगी। यह एक डिफेक्टिव पीस था। वैशाली का चेहरा उतर गया। वह वापस काउंटर पर गई। उन्होंने नंद किशोर साहू को दिखाते हुए कहा, “भैया, यह देखिए, इसमें तो धागा टूटा हुआ है। यह तो पूरी उधर जाएगी।” नंद किशोर साहू ने एक नजर साड़ी पर डाली और फिर बड़ी लापरवाही से बोला, “अरे मैडम, इतना छोटा-मोटा तो चलता है। आप ले जाइए, दर्जी से ठीक करवा लेना।” कुछ नहीं होगा। वैशाली का गुस्सा अब बढ़ने लगा था। उनकी आवाज थोड़ी सख्त हो गई। वह नंद किशोर साहू को बोली, “चलता कैसे है? मैं इतने पैसे दे रही हूं। कोई फोकट में तो नहीं ले रही। मुझे ठीक साड़ी चाहिए। नंद किशोर साहू भी

भड़क गया और कड़क आवाज में बोला। देखिए मैडम, अब बार-बार तो नहीं बदल सकते। आपने खुद देखकर पसंद की है। अब इसमें हमारी क्या गलती? काउंटर के पीछे खड़ा लड़का भी हंसते हुए बोला, अरे मैडम, आपने तो सब कुछ जांच परख कर ही लिया था ना। अब नाटक क्यों कर रही हो? यह सुनते ही वैशाली के आत्मसम्मान को ठेस लग गई। वह एक अफसर थी। लेकिन उससे पहले एक ग्राहक थी और एक ग्राहक के साथ ऐसा बर्ताव उन्हें बर्दाश्त नहीं था। उन्होंने दृढ़ता से कहा, सही साड़ी दो वरना मेरे पैसे वापस करो। नंद किशोर साहू ने आंखें तरेर ली और बोला पैसे वैसे वापस नहीं होंगे। ज्यादा ड्रामा मत

करो यहां पर। अब तक दुकान में खड़े बाकी ग्राहक भी तमाशा देखने लगे थे। कान्हा फूंसी शुरू हो गई थी। दुकान के अंदर का माहौल गर्म हो चुका था। वैशाली ने आवाज ऊंची करके बोला। दुकानदारी ऐसे नहीं चलती है। मैंने पूरा पैसा दिया है। या तो सही कपड़े दो या पैसे वापस करो। नंद किशोर साहू ने चिल्लाते हुए बोला, “क्यों? बहुत बड़ी अफसर समझती हो क्या खुद को? तुम्हारे जैसे लोग रोज आते हैं। चलो, भागो यहां से। यह सुनते ही वैशाली ने गुस्से में साड़ी का पैकेट काउंटर पर पटक दिया। भीड़ अब और बढ़ गई थी। लड़के ने पीछे से एक और तीर छोड़ा। अब शुरू हो गया इनका ड्रामा।

वैशाली ने उसे घूर कर देखा। उनकी आंखों में वह सख्ती थी जो बड़े-बड़े अपराधियों को भी चुप करा देती थी। लेकिन यहां कोई उन्हें पहचानने वाला नहीं था। नंद किशोर साहू ने गुस्से में अपनी जेब से मोबाइल निकाला और चिल्लाते हुए बोला, “ज्यादा हंगामा मत करो। वरना मैं अभी पुलिस को फोन करता हूं। वह बताएगी तुम्हें कि धौस कैसे जमाते हैं।” वैशाली के चेहरे पर एक व्यंग्यात्मक मुस्कान आई। हां, कर लो, बुला लो पुलिस को। हम भी तो देखें तुम्हारी पुलिस क्या करती है। नंद किशोर साहू को लगा कि वह डर नहीं रही है। उसने तुरंत थाने का नंबर मिलाया और स्पीकर पर

डाल दिया। हेलो थानेदार साहब। नंद किशोर साड़ी भंडार से बोल रहा हूं। यहां एक औरत बिना वजह झगड़ा कर रही है। दुकान में हंगामा मचा रखा है। जल्दी किसी को भेजिए। फोन करते ही भीड़ में फुसफुसाहट और तेज हो गई। अरे इसने तो पुलिस ही बुला ली। वैशाली ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने पास पड़ी एक पुरानी लोहे की कुर्सी उठाई और दुकान के गेट पर जाकर बैठ गई। उन्होंने आसमान की तरफ देखा और एक पल के लिए उन्हें तारा का चेहरा याद आया। उसकी शादी का सपना याद आया। लेकिन अब यह सिर्फ एक साड़ी की बात नहीं थी। यह उनके आत्मसम्मान की लड़ाई बन चुकी थी। वह पीछे नहीं हट सकती थी। वह उस

कुर्सी पर शांति से बैठी थी जैसे किसी तूफान के आने का इंतजार कर रही हो। मन में एक भरोसा था। उन्होंने खुद से कहा, कोई बात नहीं, पुलिस आएगी, मुझे पहचान लेगी और यह सारा तमाशा 1 मिनट में खत्म हो जाएगा। आखिर वह इसी जिले की एसएसपी वैशाली थी। हर थानेदार, हर दरोगा उन्हें पहचानता था। पूरा पुलिस डिपार्टमेंट उन्हें सलाम करता था, लेकिन शायद किस्मत को आज उनकी परीक्षा लेनी थी। 10 मिनट बाद पुलिस की एक पुरानी जीप धूल उड़ाती हुई दुकान के सामने आकर रुकी। जीप से एक दरोगा महेंद्र चौधरी और दो सिपाही नीचे उतरे। दरोगा महेंद्र चौधरी

की तोंद बाहर निकली हुई थी और चेहरे पर एक अजीब सी अकड़ थी। भीड़ उन्हें देखकर किनारे हो गई। नंद किशोर साहू दौड़कर दरोगा महेंद्र चौधरी के पास गया। उसने वैशाली की तरफ इशारा करते हुए कहा। साहब यही है वह औरत बिना बात के झगड़ा कर रही है। हमारी दुकान का माहौल खराब कर रही है। दरोगा महेंद्र चौधरी ने बिना कोई सवाल पूछे वैशाली को ऊपर से नीचे तक घृणा भरी नजरों से देखा। वैशाली अभी भी कुर्सी पर बैठी थी। उनके चेहरे पर थकान थी। लेकिन आंखों में एक उम्मीद भी थी कि अब सब ठीक हो जाएगा। तभी दरोगा महेंद्र चौधरी ने गरज कर पूछा। कौन हो तुम? क्या तमाशा लगा रखा

है यहां? वैशाली ने शांत होकर जवाब दिया, तमीज से बात करो। फिर उन्होंने कहा, मैं वैशाली सिंह हूं। दरोगा महेंद्र चौधरी अकड़ते हुए बोला, वैशाली सिंह हो तो क्या हुआ? किसी रानी के खानदान से हो क्या? दरोगा महेंद्र चौधरी ने बीच में ही उनकी बात काट दी। क्या तुम्हें दुकान में हंगामा करने का लाइसेंस मिल गया है? क्या? वैशाली ने एक गहरी सांस ली। शायद तुम्हें पता नहीं है कि तुम किससे बात कर रहे हो। दरोगा महेंद्र चौधरी जोर से हंसा। हां हां पता है। अब सबकी मां बनोगी तुम। ज्यादा अकड़ मत दिखाओ। सीधे थाने चलो। वहां तुम्हारी सारी अकड़ निकालता हूं। एक

सिपाही आगे बढ़कर वैशाली का हाथ पकड़ने लगा। वैशाली ने उसे घूर कर देखा तो वह एक पल को झिझक गया। यह देख भीड़ में खड़ी औरतें कानाफूसी करने लगी और बोली, यह तो अच्छे घर की है, पर है बड़ी झगड़ालू। तभी नंद किशोर साहू ने दरोगा महेंद्र चौधरी को कंधे से पकड़ कर धीरे से दुकान के अंदर ले गया। काउंटर के पीछे ले जाकर उसने अपनी जेब से कुछ नोट निकाले और दरोगा महेंद्र चौधरी की जेब में खिसका दिए। साहब, इसको उठा ले जाएं यहां से। उसने फुसफुसा कर कहा। यह हमारा धंधा खराब कर रही है। जो भी खर्चा पानी होगा मैं देख लूंगा। दरोगा महेंद्र चौधरी ने नोटों पर एक नजर डाली।

उसके होठों पर एक गिरी हुई मुस्कान आई। रिश्वत की गर्मी ने उसकी अकड़ को और बढ़ा दिया। वह भीड़ की तरफ देखते हुए बाहर निकला। वैशाली अब भी उसी कुर्सी पर बैठी थी। वह सोच रही थी, अब तक तो इसने मुझे पहचान लिया होगा। अब यह नाटक खत्म होगा। पर दरोगा महेंद्र चौधरी ने सिपाहियों को इशारा किया। इस बार दोनों सिपाहियों ने आगे बढ़कर वैशाली की दोनों बाहें मजबूती से पकड़ ली। वैशाली चौंक गई। यह क्या बदतमीजी है? मेरी बात तो सुनो। दरोगा महेंद्र चौधरी ने सिटी बजाते हुए जीभ की तरफ इशारा किया और बोला, बहुत बोल लिया तुमने। अब थाने चलो। वहीं पता चलेगा कौन

कितना बड़ा अफसर है। भीड़ में से किसी ने ताना कसा। देखो देखो बड़ी मैडम बनने आई थी अब हवालात में चक्की पीसेंगी। नंद किशोर साहू दूर खड़ा अपनी मूछों पर ताव देते हुए हंस रहा था। एसएपी वैशाली की आंखों में आग जल रही थी। लेकिन उस वक्त उनकी आवाज से ज्यादा भारी था कानून के रखवालों का वह हाथ जो आज एक बेकसूर को पकड़ रखा था। उन्होंने कोई विरोध नहीं किया। वह जानती थी कि अगर उन्होंने यहां अपनी पहचान बताई तो यह लोग शायद यकीन ना करें और तमाशा और बढ़ जाए। जीप का दरवाजा खुला। सिपाहियों ने उन्हें लगभग ढकियाते हुए अंदर बिठा दिया। जीप का दरवाजा बंद हुआ और उनकी

इज्जत, उनका पद सब कुछ उस बंद दरवाजे के पीछे कैद हो गया। गाड़ी जैसे ही गली से बाहर निकली, नंद किशोर साहू ने राहत की सांस ली और अपनी दुकान का शटर गिरा दिया। धंधा फिर से अपनी रफ्तार पकड़ लेगा। लेकिन एसपी वैशाली सिंह की इज्जत को थाने के रास्ते पर घसीटा जा रहा था। पुलिस जीभ धूल उड़ाती हुई थाने के गेट पर आकर रुकी। यहां बाजार की भीड़ तो नहीं थी। बस कुछ मुजरिमों के रिश्तेदार और पुलिस वाले थे। माहौल में एक अजीब सी उदासी और खामोशी थी। दरोगा महेंद्र चौधरी जीप से उतरा और एक सिगरेट सुलग कर कश लेने लगा। और सिपाही ने जीभ का दरवाजा खोला और वैशाली को बाहर

खींच कर निकाला गया। लेकिन वैशाली सिर्फ चुप थी। कोई बहस नहीं, कोई गिड़गिड़ाहट नहीं। उनकी सीधी नजर दरोगा महेंद्र चौधरी के चेहरे पर थी। लेकिन रिश्वत और अहंकार में डूबे उस दरोगा महेंद्र चौधरी को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। दरोगा महेंद्र चौधरी ने उन्हें धक्का देते हुए कहा, ले चलो थाने के अंदर। थाने में अंदर एक हेड कांस्टेबल बैठा फाइलें पलट रहा था। उसने पूछा साहब यह कौन लड़की है? दरोगा महेंद्र चौधरी ने घमंड से कहा, “यह बहुत बड़ी तोप बनी फिरती थी। एक दुकानदार से झगड़ा कर रही थी। ऐसे ही लोग शहर में दंगे करवाते हैं। इसे हवालात में डालो। सारी गर्मी

निकल जाएगी। वैशाली ने एक आखिरी बार कोशिश की। मैं वैशाली सिंह हूं। हेड कांस्टेबल ने बीच में ही टोक दिया। नाम पता बाद में कागज में लिख लेंगे। मैडम पहले अंदर चलिए। एक सिपाही ने लोहे का एक भारी गेट खोला और उन्हें हवालात में डाल दिया। अंदर सीलन भरी हवालात थी। दीवारों से पपड़ी उतर रही थी और हवा में एक अजीब सी बदबू थी। एक कोने में टूटी हुई चारपाई पड़ी थी। वैशाली ने एक गहरी सांस ली। यह वही हवालात थी जिसका उन्होंने कुछ दिन पहले ही निरीक्षण किया था। आज वह खुद इसमें एक कैदी बनकर खड़ी थी। दरोगा महेंद्र चौधरी ने बाहर से

ताला लगाया और जोर से हंसा और बोला अब बनो अफसर और रानी बाई हवालात की दीवारों पर वैशाली के चेहरे की परछाई कांप रही थी और मन ही मन सोच रही थी। कितने नीचे गिर चुके हैं यह लोग। इनकी की सजा जरूर दूंगी। यह कैसा इंसाफ है जो सच और झूठ में फर्क नहीं कर सकता। इतना सोच ही रही थी। तभी उसी थाने में हवालात के बाहर लकड़ी की एक पुरानी कुर्सी पर एक दूसरा दरोगा बैठा था। उसका नाम था अभिषेक मिश्रा। उम्र ज्यादा नहीं थी। लेकिन वो अपने काम में बेहद ईमानदार और तेज माना जाता था। वो एक केस की फाइल देख रहा था। जब उसकी जीभ के आने की, गेट के खटखटाने की और ताला बंद होने

की आवाज सुनाई दी। अभिषेक मिश्रा ने सिर उठाकर देखा। उसकी नजर हवालात की सलाखों के पीछे गई। अंदर लाल सूट पहने एक औरत चुपचाप जमीन पर बैठी थी। लेकिन उसके चेहरे पर कोई डर या घबराहट नहीं थी। वही शांति, वही तेवर, वही रुतबा जो उसने कई बार जिले की बड़ी-बड़ी मीटिंग्स में देखा था। उसने अपनी फाइल बंद की। एक अजीब सी बेचैनी उसे हवालात की तरफ खींच ले गई। उसने पास जाकर हवालात के छोटे से झरोके से अंदर झांका। एक सेकंड के लिए उसका माथा ठनका। अरे यह तो उसके मुंह से बस इतना ही निकला। उसने पास खड़े एक सिपाही को इशारा किया। यह कौन

है? किस केस में लेकर आए हो? सिपाही ने हंसते हुए पूरी कहानी बता दी। साहब एक दुकानदार से झगड़ा कर रही थी। दरोगा महेंद्र चौधरी साहब पकड़ लाए। कह रहे थे बड़ी अफसर बनती थी। अभिषेक ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया। उसकी आंखें सीधे अंदर देख रही थी। तभी हवालात में बैठी वैशाली ने भी नजर उठाकर उसे देखा। एक पल के लिए दोनों की आंखें मिली और अगले ही पल अभिषेक का खून सूख गया। वह समझ गया कि कितना बड़ा बवंडर आ चुका है। यह कोई आम औरत नहीं है। यह पूरे जिले की एएसपी वैशाली सिंह है। वह सिपाही पर दहाड़ा यह कोई मजाक नहीं है। गेट खोल जल्दी। सिपाही घबरा गया और बोला

पर दरोगा महेंद्र चौधरी साहब ने मना किया है। अभिषेक की आवाज पूरे थाने में गूंज गई। मैंने कहा गेट खोल। यह पूरे जिले की एसपी वैशाली सिंह हैं। तुम्हारे जैसे 50 दरोगा महेंद्र चौधरी मिलकर भी इनका बाल बांका नहीं कर सकते। यह सुनते ही सिपाही के हाथ पैर कांपने लगे। उसने कांपते हाथों से चाबी निकाली और ताले में लगाई। ताला खुला, गुंडा हटा। अभिषेक ने सलाखों के उस पार खड़ी एसपी वैशाली सिंह को पूरी ताकत से सैल्यूट ठोका। उसकी आवाज में शर्मिंदगी और सम्मान दोनों थे। मैडम माफ कीजिएगा हमसे बहुत बड़ी गलती हो गई। मैं अभी इस गलती की भरपाई करता हूं। हवालात की वही

दीवारें जो कुछ देर पहले वैशाली की पहचान को मिटा रही थी। अब सच को पूरी इज्जत से बाहर आते हुए देख रही थी। हवालात का ताला खुलते ही एसपी वैशाली सिंह बाहर आई। उनका चेहरा शांत था। लेकिन उनकी आंखों में एक तूफान छिपा था। अभिषेक ने उन दोनों सिपाहियों और हेड कांस्टेबल को जमकर फटकार लगाई। कुछ ही मिनटों में यह खबर थाने से बाहर जैसे ही पहुंची कि हवालात में बंद औरत कोई आम महिला नहीं बल्कि पूरे जिले की एसपी वैशाली सिंह है। दरोगा महेंद्र चौधरी के होश उड़ गए। उसका चेहरा पीला पड़ गया। माथे पर पसीने की बूंदे झलक आई। अभी तक वह

अपनी बहादुरी और अकड़ दिखा रहा था। लेकिन अब उसकी टांगे कांप रही थी। वह बेतहाशा थाने की ओर भागा। सीढ़ियां चढ़ते हुए उसके पैर फिसल रहे थे। सांसे तेज हो गई थी। कमरे का दरवाजा खोला तो सामने वही दृश्य था। हवालात खुल चुकी थी। एएसपी वैशाली सलाखों से बाहर आ चुकी थी। चारों तरफ पुलिस वाले खामोश खड़े थे जैसे किसी अपराध पर गवाह हो। दरोगा महेंद्र चौधरी ने जैसे ही वैशाली को देखा, उसकी आंखों में खौफ उतर आया। वह दौड़कर उनके पैरों में गिर पड़ा। माफ कर दीजिए मैडम। मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। मैं आपको पहचान नहीं पाया। आप चाहे तो जो सजा दें मैं झेल लूंगा। बस मुझ

पर दया कर दीजिए। उसकी आवाज कांप रही थी। हाथ जोड़कर गिड़गिड़ा रहा था। पूरे थाने में सिर्फ उसकी खून हारती हुई आवाज गूंज रही थी। लेकिन वैशाली का चेहरा शांत था। उनकी आंखों में गुस्सा नहीं बल्कि एक ठंडी शक्ति थी। वह शक्ति जो अपराधी को पिघला दे। उन्होंने धीरे से कदम पीछे हटाए। उसकी ओर देखा और कड़क आवाज में कहा। तू सोच रहा है कि गिड़गिड़ाने से तेरी गलती माफ हो जाएगी। याद रख यह कुर्सी कोई सौदा नहीं है जो रिश्वत और डर से बच जाए। यह जिम्मेदारी है और तूने उस जिम्मेदारी को पैसों और झूठे अहंकार के नीचे कुचल डाला। दरोगा महेंद्र चौधरी रोते हुए बोला, मैडम, रहम

कर दीजिए। घर वाले बच्चे सब भूखे मर जाएंगे। मैं अपनी पत्नी की कसम खाता हूं। अब कभी ऐसी गलती नहीं होगी। वैशाली ने उसकी बात बीच में ही रोक दी। उनकी आवाज पूरे थाने में गड़गड़ाहट की तरह गूंजी। बस अब तेरी यह नौटंकी मुझे और नहीं सुननी। तूने आम महिला समझकर जिस तरह से मेरे साथ दुर्व्यवहार किया, उसी तरह तूने ना जाने कितनों के साथ ऐसा काम किया होगा। तू माफी के लायक नहीं है। आज से तू सस्पेंड है। एसपी वैशाली की यह बात सुनते ही पूरा थाना सन्नाटे में डूब गया। दरोगा महेंद्र चौधरी वहीं जमीन पर गिरा। सिर पकड़ कर सुबकने लगा। उसके होंठ कांप रहे थे। लेकिन अब

उसके पास कोई दलील नहीं बची थी। अभिषेक ने तुरंत रिपोर्ट निकाली। सस्पेंशन का आदेश लिखा और उस दरोगा महेंद्र चौधरी को वहीं मौजूद पुलिस जीप में बैठाकर लाइन हाजिर करवा दिया। अब उसकी अकड़ धूल हो चुकी थी। अगले ही दिन उस कपड़ा नंद किशोर साहू को भी नोटिस भेज दिया गया। ग्राहक के साथ धोखाधड़ी, झूठा केस दर्ज करवाना और प्रशासन के काम में बाधा डालना। उसकी दुकान का लाइसेंस रद्द करने की कार्यवाही शुरू हो गई। रात काफी हो चुकी थी। लेकिन वैशाली ने एक पल भी आराम नहीं किया। उन्होंने वाशरूम जाकर अपने कपड़े ठीक किए। चेहरे पर पानी के छींटे मारे। वह दर्द, वह

अपमान सब कुछ उन्होंने अपने अंदर समेट लिया था। एक सिपाही ने कहा, मैडम सरकारी गाड़ी भेज देते हैं। वैशाली ने सिर हिला दिया। नहीं, मैं अपनी कार से ही जाऊंगी। वह फिर से अफसर नहीं। सिर्फ एक बहन बनना चाहती थी। थाने से बाहर निकलकर जब वह अपनी पुरानी कार में बैठी तो उनकी आंखों में आंसू आ गए। लेकिन उन्होंने उन्हें बहने नहीं दिया। कुछ ही घंटों बाद उनकी गाड़ी उसकी घर के गेट पर रुकी। शादी के घर में शहनाई की गूंज थी। चारों तरफ हंसीज़ाक, नाच- गाना और मेहमानों की चहल-पहल थी। तारा अपनी सहेलियों से घिरी हुई थी और उसके चेहरे पर दुल्हन बनने की एक अनोखी

चमक थी। उस चमक के बीच उसकी आंखें बार-बार अपनी बड़ी बहन वैशाली को ढूंढ रही थी। वैशाली वहीं थी। हर रस्म में तारा के साथ खड़ी। कभी उसकी चुनरी ठीक करती, कभी उसे छेड़कर हंसा देती। चेहरे पर एक शांत और प्यारी सी मुस्कान थी। जैसे कल रात कुछ हुआ ही ना हो। उन्होंने तारा को वह मरून रंग की साड़ी दी तो तारा की आंखें खुशी से भर गई। दीदी, यह कितनी सुंदर है। आपने मेरे लिए सबसे अच्छी चीज चुनी है। वैशाली बस मुस्कुरा दी। बोली, “अरे पगली, तेरे लिए तो जान भी हाजिर है, लेकिन उस मुस्कान के पीछे एक गहरा समंदर छिपा था। कल रात जो कुछ भी हुआ, वह किसी बुरे सपने की तरह

बार-बार उनके दिमाग में कौंध रहा था। वह हवालात की सीलन भरी बदबू, वह दरोगा महेंद्र चौधरी की गिरी हुई हंसी, वह नंद किशोर साहू का घमंडी चेहरा और भीड़ की वह चुभती हुई निगाहें, सब कुछ उनकी आत्मा पर किसी घाव की तरह ताजा था। उन्होंने उस अपमान के घूंट को पिया जरूर था, लेकिन वह उनके गले में अटका हुआ था। वह मुस्कुरा रही थी, लेकिन उनका मन बेचैन था। वह सोच रही थी, क्या दरोगा महेंद्र चौधरी को माफ कर देना चाहिए था? आखिर उसने अपने बीवी बच्चों की कसम खाई थी कि आज के बाद कभी ऐसा काम नहीं करेगा? उसकी आंखों में डर से ज्यादा अपने घर की फिक्र झलक रही थी।

वैशाली के दिल में बार-बार सवाल उठ रहा था। क्या मैंने सही किया या गलत? उनकी आत्मा जानती थी कि वर्दी का अपमान बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। लेकिन तभी उसे थाने का अंतिम दृश्य याद आया। जब दरोगा महेंद्र चौधरी को सस्पेंड करके ले जाया जा रहा था तो उसके चेहरे पर एक ऐसी हंसी थी कि मानो उसे कुछ हुआ ही नहीं हो। उसकी नजरें यह इशारा कर रही थी कि तुमको देख लेंगे। उसके अंदर कोई डर नहीं था। उनकी आंखें शून्य में टिक गई। वह उसकी आंखों में भय होने लगा। तभी तारा ने धीरे से उनका हाथ हिलाया और मुस्कुरा कर बोली दीदी आप कहां खोई हुई हैं? उसकी आवाज ने

वैशाली की सोच को तोड़ दिया। वैशाली चौंक कर हकीकत में लौटी। कहीं नहीं तारू बस देख रही हूं। मेरी गुलियां आज कितनी सुंदर लग रही है। उन्होंने बड़ी सफाई से बात को टाल दिया। वह अपनी बहन की जिंदगी के सबसे बड़े दिन में किसी भी तरह की कड़वाहट नहीं चाहती थी। दीदी कल आप इतनी देर से क्यों आई? और मां बता रही थी कि आपका फोन भी नहीं लग रहा था। सब ठीक तो है ना? तारा की आंखों में चिंता साफ झलक रही थी। वैशाली ने एक गहरा सांस लिया। वह अपनी छोटी बहन से झूठ नहीं बोलना चाहती थी, लेकिन सच बताने का यह सही वक्त नहीं था। हां, सब ठीक है। बस एक जरूरी ऑफिशियल काम में फंसी

थी। लेकिन देख मैंने अपना वादा पूरा किया। तेरी साड़ी ले आई। रात को जब सब लोग संगीत और नाच गाने में डूबे थे। वैशाली अकेले छत पर चली गई। ठंडी हवा के बीच उसने अभिषेक को फोन किया और बोला मुझे दरोगा महेंद्र चौधरी और दुकानदार नंद किशोर साहू की पूरी जानकारी चाहिए। अभिषेक ने भरोसा दिलाया। सुबह तक रिपोर्ट दे दूंगा। अगले दिन हल्दी की रस्म के बीच फोन आया। अभिषेक ने बताया नंद किशोर साहू के कई धोखाधड़ी के केस दबाए गए हैं और दरोगा महेंद्र चौधरी एमएलए रघुवीर तिवारी का खास आदमी है। अवैध शराब, जमीन, कब्जा, वसूली सब उसी के लिए करता

है। वैशाली ने सब जोड़ लिया। तो नंद किशोर साहू भी उसी के नेटवर्क का हिस्सा है। शाम होते ही बारात की खुशी पर अचानक साया छा गया। एक जीप से कुछ गुंडे कूदे और पंडाल के बाहर खौफ का तूफान उतर आया। उनके लीडर बलराम ने चिल्लाकर शादी रोकने को कहा। रोको यह शादी। उसकी आवाज में इतनी कड़वाहट थी कि संगीत तुरंत बंद हो गया। पूरे पंडाल में सन्नाटा छा गया। उसने सबके सामने तारा पर इल्जाम लगाया कि उसने उसके भाई टिंकू भाई से 50 लाख उधार लिए हैं। और अब वह पैसे लौटाए बिना शादी करके भागना चाहती है। दूल्हे के घरवाले सक्ते में आ गए और

मेहमान कानाफूसी करने लगे। तारा जिस पर कुछ देर पहले खुशियों के फूल बरसाए जा रहे थे। अब उस पर झूठे इल्जामों की कीचड़ उछाली जा रही थी। वह फूट-फूट कर रोने लगी। वैशाली का खून खौल उठा। वह जानती थी कि यह रघुवीर तिवारी की घटिया चाल है। उन्हें और उनके परिवार को बदनाम करने का तरीका। वह एक शेरनी की तरह आगे बढ़ी। उसकी आंखों में ना कोई डर था, ना कोई घबराहट। बस एक सर्द गुस्सा था। क्या सबूत है तुम्हारे पास? उसकी आवाज शांत लेकिन इतनी पैनी थी कि बलराम भी एक पल को ठिठक गया। बलराम ने कुछ नकली स्टैंप पेपर हवा में लहराए। वैशाली

ने एक नजर में ही पहचान लिया कि वह जाली हैं। अच्छा तो अपने टिंकू भाई का नंबर दो। मैं अभी उससे बात करती हूं। यह सुनकर गुंडे घबरा गए। वह तो शहर से बाहर है। तो फिर यह कचरे के टुकड़े मुझे मत दिखाओ। वैशाली ने कागज छीनकर उसके मुंह पर फेंक दिए। अब तुम्हारे पास दो रास्ते हैं। या तो चुपचाप यहां से निकल जाओ या मैं अभी फोर्स बुलाकर धोखाधड़ी, मानहानि और एक पब्लिक सर्वेंट के परिवार को धमकाने के जुर्म में तुम सबको अंदर करवा दूंगी। पब्लिक सर्वेंट का नाम सुनते ही गुंडों के होश उड़ गए। उन्हें अंदाजा नहीं था कि वह किससे पंगा ले रहे हैं। 10 सेकंड के अंदर

वह सब दुम दबाकर भाग गए। माहौल संभल तो गया लेकिन जश्न का रंग फीका पड़ चुका था। वैशाली ने दूल्हे के पिता से हाथ जोड़कर माफी मांगी और उन्हें यकीन दिलाया कि उनकी बहन बेकसूर है। उन्होंने वादा किया कि वह इस साजिश की जड़ तक पहुंचेंगी। उस दिन वैशाली ने ठान लिया था कि रघुवीर तिवारी ने उनकी बहन की इज्जत पर हाथ उठाकर अपनी तबाही को दावत दी है। तारा की विदाई के बाद घर की खामोशी वैशाली के गुस्से को और बढ़ा रही थी। अगले ही दिन उन्होंने सबसे पहले नंद किशोर साहू को गिरफ्तार किया। सरकारी गवाह बनने का दबाव डाला। डर के बावजूद नंद किशोर साहू चुप रहा। लेकिन जब

उसने देखा कि वैशाली ने रघुवीर तिवारी के दाहिने हाथ टिंकू भाई के अवैध जमीन कब्जों पर बुलडोजर चलवा दिया। करोड़ों का गैरकानूनी निर्माण मिट्टी में मिला दिया और 20 गुंडों को गिरफ्तार कर लिया। तब नंद किशोर साहू टूट गया। उसने रघुवीर तिवारी के राज खोले। बताया कि एक काली डायरी है जिसमें हर रिश्वत हर धंधे का पूरा हिसाब लिखा है। वह डायरी उसके फार्म हाउस में छिपी थी। वैशाली ने आधी रात को ऑपरेशन धर्म चलाया। बिना सायरन और रोशनी वाली पुलिस गाड़ियां फार्म हाउस पहुंची। दरवाजे तोड़े गए। गार्ड्स हथियार डालने पर मजबूर हुए। वैशाली सीधे रघुवीर तिवारी के कमरे

में पहुंची। नींद से चौंक कर वह चिल्लाया। एएसपी वैशाली तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई? वैशाली ने सर्च वारंट उसके चेहरे पर फेंकते हुए कहा, “कानून को काम करने के लिए इजाजत की जरूरत नहीं होती।” फार्म हाउस की तलाशी में करोड़ों की नकदी और वह काली डायरी बरामद हुई। वैशाली ने डायरी उठाकर ठंडी आवाज में कहा, खेल खत्म। एमएलए साहब रघुवीर तिवारी उसी रात गिरफ्तार हुआ। अगले दिन मीडिया में डायरी और गवाही के सबूत पहुंचे। अदालत में नंद किशोर साहू की गवाही और डायरी के पन्नों ने पूरा गिरोह सलाखों के पीछे पहुंचा दिया। शहर ने बरसों बाद चैन की सांस ली। अपराध का साम्राज्य

ढह चुका था। शाम को तारा ने छत पर वैशाली से कहा, दीदी, मुझे आपके लिए डर लगता है। वैशाली मुस्कुराई। उसका हाथ थामा और बोली, “मैं अकेली नहीं हूं। तारू, मेरे साथ कानून है, सच्चाई है और तेरी दुआएं हैं। यह वर्दी सिर्फ कपड़ा नहीं, एक कसम है और मैंने अपनी कसम निभाई है। डूबते सूरज की रोशनी में उनकी वर्दी चमक रही थी। यह वर्दी अब सिर्फ वर्दी नहीं बल्कि इंसाफ और इज्जत की जीत की पहचान बन चुकी थी। तो दोस्तों, यह कहानी केवल मनोरंजन और शिक्षा के उद्देश्य से बनाई गई है। इसमें दिखाए गए सभी पात्र, घटनाएं और संवाद काल्पनिक हैं। किसी भी वास्तविक व्यक्ति, संस्था या

घटना से इनका कोई संबंध नहीं है। कृपया इसे केवल कहानी के रूप में देखें और इसका आनंद लें। हम किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं चाहते हैं। अगर आपको यह कहानी पसंद आई हो तो इसे लाइक करें और ज्यादा से ज्यादा लोगों तक शेयर करें। कमेंट करके बताएं कि आपको सावित्री का कौन सा कदम सबसे अच्छा लगा और हमारे चैनल को सब्सक्राइब करना ना भूलें क्योंकि हम आपके लिए ऐसी ही प्रेरणादायक कहानियां हो लाते रहेंगे। धन्यवाद।