जब जिले के सबसे बड़े अधिकारी डीएम पूजा शर्मा की मां एक सादे कपड़ों में गरीब औरत की तरह एक बड़े और सरकारी बैंक में पैसे निकालने के लिए जाती है तो बैंक के सारे अधिकारी महिला को भिखारी समझ लेते हैं। किसी को नहीं पता था कि यह औरत जिले के सबसे बड़े अधिकारी डीएम मैडम साहिबा की मां है। सब ने सोचा यह तो कोई भिखारी औरत है और यह इस बड़े और प्रोफेशनल बैंक में क्या करने आई होंगी? इतने में महिला धीरे-धीरे चलते हुए काउंटर की ओर जाती है। काउंटर पर रोशनी नाम की सुरक्षा गार्ड बैठी हुई थी। बुजुर्ग औरत ने रोशनी से कहा, बेटी मुझे बैंक से पैसे निकलवाने

हैं। यह रहा चेक। रोशनी ने बिना चेक देखे औरत से कहने लगी, तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई? बैंक में आने की यह बैंक तुम्हारे जैसों के लिए नहीं है। भिखारी काहे कि यह बैंक बड़े लोगों का है। यहां पर बड़े-बड़े लोगों के खाते हैं। तुम्हारे जैसी औरत की तो औकात ही नहीं है। ऐसे बैंक में खाता खुलवाने की निकलो। यहां से वरना मार के भगाऊंगी। औरत ने कहा, बेटी तुम पहले तो चेक देखो। मुझे 5 लाख कैश निकलवाने हैं। यह सुनकर तो रोशनी भड़क उठी। यह कोई मजाक करने की जगह नहीं है। क्या लगता है तुम्हें? तुम मुझे कुछ भी बोलोगी और मैं मान लूंगी। तुम्हारी जैसी औरत की औकात ही

नहीं है। और क्या बोला? तुमने 5 लाख इतने पैसे कभी देखे हैं? तुमने अपने जीवन में जल्दी यहां से जाओ वरना धक्के देकर निकाल दूंगी। उसी समय बैंक मैनेजर ने अपने केबिन से बाहर झांका और पूछा। कौन है जो इतना शोर मचा रहा है? रोशनी ने तुरंत कहा कोई भिखारी औरत है सर जाने का नाम नहीं ले रही है। बैंक मैनेजर गुस्से में बाहर आता है और बिना कुछ पूछे उस बुजुर्ग महिला को एक जोरदार थप्पड़ मार देता है। थप्पड़ इतना तेज था कि वह महिला लड़खड़ा कर जमीन पर गिर पड़ती है। फिर वह मैनेजर सिक्योरिटी गार्ड को आवाज देता है। क्या कर रही हो? घसीट कर बाहर निकालो। इसको पता नहीं

कहां-कहां से आ जाते हैं। यह लोग रोशनी उस महिला को जबरन बैंक से बाहर धक्का मारकर निकाल देती हैं। वहां खड़े तमाम ग्राहक और स्टाफ खामोश होकर सब देख रहे थे। किसी को नहीं मालूम था कि वह औरत जिले की डीएम पूजा शर्मा की मां है। और यह सारा दृश्य बैंक के सीसीटीवी कैमरों में रिकॉर्ड हो रहा था। घर पहुंचकर वह महिला रोते हुए अपनी बेटी डीएम पूजा शर्मा को फोन करती हैं और सारी बात बताती हैं। कैसे बैंक में उनके साथ बेइज्जती की गई? कैसे उन्हें अपमानित करके बाहर निकाल दिया गया। पूजा यह सुनते ही अंदर तक कांप जाती है। उसके लिए यह किसी आग से कम नहीं था। वह रोते

हुए अपनी मां से कहती है, मां, कल मैं खुद आ रही हूं और आपके साथ चलकर उसी बैंक से पैसे निकलवाऊंगी। अगले दिन सुबह डीएम पूजा शर्मा साधारण सूती साड़ी पहनकर अपनी मां के साथ बैंक जाने को तैयार होती है। मां-ब एक दूसरे को देखकर गले लगते हैं। आंखों में आंसू हैं। गर्व और पीड़ा दोनों पूजा की मां को अपनी बेटी पर नाज है। उन्होंने कितनी कठिनाइयों से उसे पाला पढ़ाया और आज इतने ऊंचे पद तक पहुंचाया। सुबह के ठीक 11:00 बजे मां बेटी बैंक के बाहर पहुंचती हैं। बैंक अभी तक नहीं खुला था। जबकि समय 10 बजे का था। पूजा शांतिपूक दरवाजे के

पास बैठकर इंतजार करती हैं। कुछ मिनटों बाद जब बैंक खुलता है, दोनों अंदर प्रवेश करती हैं। दोनों का पहनावा इतना साधारण था कि वहां मौजूद ग्राहक और कर्मचारी उन्हें एक आम ग्रामीण महिला समझ बैठते हैं। कोई सोच भी नहीं सकता था कि यह वही पूजा शर्मा है। जिले की डीएम धीरे-धीरे दोनों काउंटर की तरफ बढ़ती है। वहां वही रोशनी बैठी होती है। पूजा विनम्रता से कहती है, मैडम हमें पैसे निकालने हैं। मां की दवाइयां लेनी है और कुछ जरूरी काम भी हैं। रोशनी ने दोनों महिलाओं को ऊपर से नीचे तक देखा। साड़ी में एक बुजुर्ग महिला और एक साधारण

कपड़ों में युवती किसी भी कोण से बड़े अवसर नहीं लग रही थी। उसने व्यंग करते हुए कहा, “आप शायद गलत बैंक में आ गई हैं। यह ब्रांच हाई प्रोफाइल क्लाइंट से डील करता है। पूजा शर्मा ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, एक बार चेक कर लीजिए। मैडम अगर नहीं है तो हम चले जाएंगे। रोशनी ने बेमन से लिफाफा लिया और कहा थोड़ा समय लगेगा वेटिंग चेयर पर बैठ जाइए। पूजा मां का हाथ थामे कोने की एक खाली कुर्सी पर बैठ गई। उन्होंने मां को पानी दिया और खुद भी शांत बैठी रही। बैंक में मौजूद लोग उन्हें घूर रहे थे। यहां अमूमन अमीर व्यापारी, अफसर और रसूखदार लोग आते थे। महंगी गाड़ियों और

चमकदार कपड़ों में। ऐसे में साधारण कपड़ों में बैठी मां-ब का वहां होना सबको अजीब लग रहा था। चारों तरफ फुसफुसाहटें शुरू हो गई। किस गांव से आई हैं? पेंशन के चक्कर में आई होंगी। इनका खाता तो यहां हो ही नहीं सकता। पूजा सब कुछ सुन रही थी, लेकिन शांत बनी रही। उनकी मां थोड़ी असहज थी, लेकिन बेटी का संयम देखकर खुद को संभाल रही थी। थोड़ी देर बाद पूजा ने रोशनी से कहा, “अगर आप व्यस्त हैं, तो कृपया मैनेजर से मिलवा दीजिए। मुझे जरूरी बात करनी है।” रोशनी झुनझुलाकर फोन उठाती है और मैनेजर के केबिन में कॉल कर देती है। सर, एक महिला

है। कह रही हैं कि आपसे मिलना है। भेज दूं।” मैनेजर ने शीशे से झांक कर देखा। साधारण सी महिला अपनी मां के साथ बैठी थी। अफसर जैसी तो बिल्कुल नहीं लग रही थी। उसने ठंडे स्वर में कहा, “मेरे पास फालतू लोगों के लिए समय नहीं है। कह दो बैठे और इंतजार करें।” रोशनी ने कहा, “आप वेटिंग चेयर पर बैठिए सर, थोड़ी देर में फ्री होंगे। पूजा ने कुछ नहीं कहा। बस मां का हाथ थामे वहीं शांत बैठी रही। एक अवसर की गरिमा और एक बेटी की सहनशीलता के साथ पूजा शर्मा अब तक पूरी शांति और संयम में बैठी थी। लेकिन मां की बेचैनी और लोगों की कानाफूसी देखकर उन्होंने धीरे से मां का

हाथ दबाया और कहा मां लगता है इन लोगों को फर्क नहीं पड़ता। अब मुझे खुद बात करनी होगी। वो धीरे से उठी। साड़ी का पल्लू ठीक किया और सीधा मैनेजर के केबिन की ओर बढ़ने लगी। मैनेजर जो अब तक शीशे के पीछे से उन पर निगाह रखे था घबरा गया। उसने जल्दी से बाहर निकलकर पूजा का रास्ता रोका और बोला, हां। बोलिए क्या काम है? पूजा ने वही लिफाफा आगे बढ़ाया। मुझे पैसे निकलवाना है। मेरी मां की दवाइयां लेनी है। और भी बहुत सारे काम हैं। यह रहे चेक। आप देख लीजिए। मैनेजर ने लिफाफा हाथ में लिए बिना ही बेरुखी से जवाब दिया। जब खाते में पैसे

नहीं होते तो ट्रांजैक्शन कैसे होगा? तुम्हारी तो इतनी औकात नहीं है कि तुम्हारे खाते में पैसे हो और बड़ा आया पैसे निकलवाने। पूजा अब भी बेहद शांत लहजे में बोली। अगर आप एक बार चेक कर लेते तो बेहतर रहता। ऐसे अनुमान लगाना ठीक नहीं। मैनेजर अब खुलकर हंसने लगा। भाई इतना एक्सपीरियंस है मेरा कि शक्ल देखकर ही समझ जाता हूं। किसके पास क्या है? रोज आते हैं तुम्हारे जैसे लोग और वैसे भी तुम्हारे अकाउंट में कुछ होगा। मुझे नहीं लगता अब ज्यादा भीड़ मत लगाओ। देखो सब तुम्हें ही देख रहे हैं। माहौल बिगड़ रहा है। अच्छा होगा अगर अब चली जाओ। पूजा का चेहरा अब भी

स्थिर था। मगर उनकी आंखों में एक अलग चमक थी। शांति की जगह अब सख्ती उतर चुकी थी। उन्होंने बिना कुछ बोले लिफाफा टेबल पर रखा और धीमे स्वर में बोली, ठीक है, जा रही हूं। लेकिन एक विनती है, इस लिफाफे में जो भी जानकारी है, एक बार जरूर पढ़ लीजिएगा। शायद आपके काम की हो। इतना कहकर वह मां का हाथ थामे मुड़ी और दरवाजे की ओर बढ़ गई। लेकिन जैसे ही गेट पर पहुंची वह पलटी और गहरी निगाहों से देखते हुए बोली बेटा इस व्यवहार का अंजाम तुम्हें भुगतना पड़ेगा वक्त ही समझा देगा। पूरा बैंक कुछ पल के लिए सन्नाटा में डूब गया। कोई शोर नहीं, कोई गुस्सा नहीं। बस गरिमा से लिपटी

एक चेतावनी जो किसी तूफान से कम नहीं थी। मैनेजर एक पल को ठिटका फिर बुदबुदाया। बुढ़ापे में कुछ भी बोल जाते हैं। लोग चलो जाने दो और वापस अपनी सीट पर बैठ गया। उसके सामने वही लिफाफा अब भी यूं ही टेबल पर पड़ा था। अनदेखा अनपढ़ा। उसे यह नहीं पता था कि उसी लिफाफे में वह सच छुपा है जो उसकी दुनिया पलट देने वाला है। अगले दिन बैंक की वही रूटीन शुरू होती है। क्लर्क अपने काम में कैशियर अपनी गिनती में और मैनेजर फिर से उसी पुराने रब में। लेकिन इस बार एक फर्क था। वही बुजुर्ग महिला जिसके साथ एक दिन पहले अपमान की सारी हदें पार की गई थी। आज फिर उसी बैंक

में दाखिल होती है। पर आज वह अकेली नहीं थी। उसके साथ एक तेजतर्रार अफसर था जो सूट बूट में चमक रहा था। उसके हाथ में चमचमाता हुआ ब्रीफ केस था। उन दोनों के प्रवेश करते ही पूरे बैंक की नजरें उसी दिशा में टिक जाती हैं। महिला बिना इधर-उधर देखे सीधा मैनेजर के केबिन की ओर बढ़ती है। मैनेजर पहले तो उसे पहचान नहीं पाता लेकिन जैसे-जैसे वह करीब आती है, चेहरा साफ दिखने लगता है। वही महिला जिसकी सारी फाइलें उसने कल ठुकरा दी थी। वही जिसकी साड़ी पर वह हंसा था। वही जिसे उसने हमारे जैसे ग्राहक नहीं चाहिए कहकर निकाल दिया था। अब उसके चेहरे पर हवाइयां

उड़ने लगती हैं। घबराकर वह खुद केबिन से बाहर आ जाता है। महिला का चेहरा आज आत्मविश्वास और गरिमा से दमक रहा था। वह रुकती नहीं। सीधा मैनेजर के सामने खड़ी होती है और तीखे स्वर में कहती है, मैनेजर साहब, मैंने कल ही कहा था कि आपके व्यवहार का अंजाम भुगतना पड़ेगा। आपने ना सिर्फ मुझे बल्कि मेरे जैसे हजारों आम नागरिकों को नीचा दिखाने की कोशिश की है। अब वक्त है सजा भुगतने का। मैनेजर बौखलाकर कहता है, आप कौन होती हैं? मुझे सिखाने वाली यह कोई आपका घर नहीं है। यह बैंक है और आप यहां मेरा कुछ। महिला उसकी बात बीच में ही काटकर मुस्कुराती है। फिर अपने साथ आए

अफसर की ओर इशारा करती है। इनसे मिलिए यह मेरे विधिक सलाहकार हैं और पूजा शर्मा कहती हैं, मैं हूं इस जिले की जिलाधिकारी डीएम। पूजा शर्मा साथ ही इस बैंक की 8% शेयर होल्डर भी और यह मेरी मां है जिनके साथ आप लोगों ने बहुत बुरा व्यवहार किया। एक क्षण के लिए पूरे बैंक में सन्नाटा छा जाता है। सभी कर्मचारी ग्राहक यहां तक कि दरवाजे के पास खड़े सुरक्षाकर्मी भी स्तब्ध रह जाते हैं। मैनेजर के चेहरे का रंग उड़ जाता है। वह कुछ कहता उससे पहले ही पूजा शर्मा फिर बोलती हैं, तुम्हें बैंक मैनेजर के पद से तत्काल हटाया जा रहा है। अब तुम्हारी पोस्टिंग फील्ड में की जा

रही है। जहां तुम्हें रोज आम जनता से मिलकर रिपोर्ट बनानी होगी। पूजा शर्मा ब्रीफ केस खोलते हैं और दो दस्तावेज निकालकर सामने रखते हैं। पहला मैनेजर के तबादले का आदेश। दूसरा कारण बताओ नोटिस जिसमें लिखा था कि आपका व्यवहार बैंक की नीति के विपरीत पाया गया है। मैनेजर अब पूरी तरह पसीनेपसीने हो चुका था। कांपते स्वर में कहता है, मैडम मुझसे गलती हो गई थी। मैं शर्मिंदा हूं। कल की बातों के लिए दिल से माफी मांगता हूं। पूजा शर्मा की आंखें अब भी स्थिर थी। पर आवाज में वह न्याय था जो किसी अधिकारी की पहचान होता है। माफी किस बात की मांग रहे हो? क्या

सिर्फ मेरा अपमान किया था तुमने? या उन तमाम ग्राहकों का जो सादगी से आते हैं? पर तुम्हारी नजर में केवल कपड़ों से आंखें जाते हैं। क्या कभी बैंक की गाइडलाइन पढ़ी है? तुमने उसमें साफ लिखा है हर ग्राहक समान है। कोई अमीर गरीब नहीं होता और जो भी कर्मचारी भेदभाव करेगा उस पर कारवाई की जाएगी। फिर एक क्षण रुक कर उन्होंने सख्त स्वर में कहा। मैं चाहती तो आज ही तुम्हें निलंबित कर देती। पर मैं एक मौका दे रही हूं खुद को सुधारने का। अगली बार तुम्हारा नाम नहीं तुम्हारी पहचान मिटा दी जाएगी। फिर उन्होंने बैंक की सुरक्षा गार्ड रोशनी

को बुलाया। रोशनी डरते हुए पास आई। उसकी आंखों में आंसू थे। कांपते हाथों से बोली, मैडम माफ कर दीजिए। मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। आगे से कभी किसी को इस तरह नहीं समझूंगी। पूजा शर्मा ने उसकी ओर देखा। फिर कहा, कपड़े देखकर किसी को छोटा मत समझो। जो सीख आज मिली है, उसे जिंदगी भर याद रखना। बैंक का पूरा स्टाफ अब नजरें झुकाए खड़ा था। उन्होंने सबकी ओर देखकर कहा पद से नहीं सोच से इंसान बड़ा होता है। जो इंसानियत को समझे वही सच्चा अधिकारी होता है। यह कहकर पूजा शर्मा अपनी मां के साथ बैंक से बाहर निकल गई। बैंक में कुछ पलों का सन्नाटा छा गया। फिर एक-एक कर सब ने एक

दूसरे की ओर देखा। सबकी सोच बदल चुकी थी। उस दिन के बाद बैंक का माहौल बदल गया। अब हर ग्राहक को सम्मान मिलने लगा। किसी की साड़ी देखकर उसे गरीब नहीं कहा गया और सभी के दिल में यह बात बैठ गई। कभी मत समझो किसी आम आदमी को मामूली। अगली बार वही तुम्हारे सामने खास बनकर खड़ा हो सकता है। तो दोस्तों, यह कहानी हमें यह समझाती है कि किसी को भी उसके पहनावे या सादगी से कभी कमजोर मत समझिए। हो सकता है वह इंसान आपसे भी कहीं ज्यादा ऊंचे पद पर हो। हर इंसान को बराबर सम्मान देना चाहिए। गरीब हो या अमीर हर किसी के साथ इंसानियत से पेश आना चाहिए। तो दोस्तों वीडियो अच्छी

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