लगता है बिजली का बिल तुम्हारे मायके वाले भरते है जो पूरे घर की लाइट जला रखी है मेरे मायके वाले की तो बात ही ना करो तो अच्छा है वो लोग राजा आदमी है कहां राजा भोज कहां गंगू तेरी मेरे मां-बाप ने मेरी शादी कहां करवा दी शाम के समय भी लाइट नहीं जलाऊ तो कब जलाऊं लक्ष्मी आने का टाइम है यह 10 मिनट में पूजा करके बंद कर दूंगी जान मत दो अपने आप अरे वह तो ठीक है लेकिन पूरे घर की लाइट जलाने का कोई काम नहीं है बिजली का बिल भरने में नानी याद आ जाएगी संजय हॉल की छोड़कर पूरे घर के लाइट्स ऑफ कर देता है और बाजार निकल जाता है। 10

मिनट के बाद पूजा करके मनीषा भी हॉल में बस एक लाइट छोड़कर सारी लाइट्स ऑफ कर देती है। तभी वहां खड़ी एक पड़ोसन कहती है हद है। जैसा है गुरु वैसा चेला। कहां है इस घर में कोई काम वाली भी टिक पाएगी। यह लोग एक-एक पैसे को पकड़ते हैं। इतने में काम वाली मनीषा के घर आती है। भाभी जी कामवाली ढूंढ रही थी क्या अब? कामवाली का नाम सुनकर घर के सभी लोग हॉल में आ जाते हैं और एक साथ कहते हैं आहा ढूंढ रहे थे। अच्छा हुआ जो आप आ गई। तभी मनीषा सबको अपने-अपने कमरे में जाने को कहती है और खुद कलावती से कहती है देख वैसे तो पहले से मैं खुद ही सारे काम कर

लिया करती थी। शादी होकर आई थी तब से खुद ही बर्तन, कपड़े, घर की सफाई साथ में इतने लोगों का खाना बनाती थी। पहले तो हम 25 लोग रहते थे। जॉइंट फैमिली थी। अब तो गिने-चुने लोग हैं। सारे अलग-अलग हो गए। लेकिन अब हो नहीं पाता। तू ठीक से बोल। क्या लेगी तू? भाभी वो तो ठीक है। पहले यह बताओ कि काम क्या-क्या करने का है मेरे को? पांच आदमी का काम ही कितना होता है? झाड़ू पोछा बर्तन साफ सफाई कपड़े बस और थोड़ा बहुत रसोई में मदद करवा देना। बाकी सब तो मैं खुद ही कर लूंगी। कलावती मन ही मन सोचती है। सारे काम तो बोल दिए। अब क्या बाकी है?

भाभी मैं 10,000 लेगी। क्या 10,000? इतने में तो पूरे महीने का राशन चल जाए। थोड़ा ठीक से बोल ना। ज्यादा कोई काम नहीं है। अब क्या बोलेगी मैं? काम तो इतना कुछ बता दिया आपने। ठीक है। अब मत बोलिएगा। 8000 से ₹1 कम नहीं लेगी मैं। अरे तू कैसी बात कर रही है? 2000 ले ले। पहले काम करके तो देख। अरे क्या देखूं करके? कलावती और मनीषा में बहुत देर तक बहस होती है। फिर जाकर मनीषा कलावती को 2000 में काम करने के लिए मना लेती है। ठीक है। घर से आएगी मैं। कलावती चली जाती है और खुद से कहती है बाबा रे कैसी औरत है उसका बस चले तो मुफ्त में ही काम करवा ले

कलावती भी किसी से कम नहीं है जैसा दाम वैसा काम इधर मनीषा खुशी से झूमने लगती है और अपनी सास से कहती है देखा मां जी बस 2000 में पूरे घर का काम हो जाएगा और आप कहती है अभी तक मैंने आपकी तरफ बचत करना नहीं सीखा और नहीं तो क्या अगर तू बचत करते तो काम वाली रखते नहीं मैंने जिंदगी भर खुद से काम किया कभी काम वाली नहीं रखी। तेरे आने के पहले तक एक-एक काम मैं खुद ही करती थी। लेकिन ठीक है अब तुम चाय सा करो। मनीषा मुंह बनाकर वहां से रसोई में चली जाती है और बड़बड़ाने लगती है। अब क्या मां जी चाहती है मुफ्त में काम वाली मिल जाए जो एक भी ना ले और मेरे घर का काम

करके जाए। जितना भी कर लूं मैं इन लोगों के लिए यह लोग मेरी एक नहीं सुनेंगे। मनीषा खुश होती है कि कल से तो उसे मदद करने के लिए काम वाली आ जाएगी। अगले दिन वह सुबह उठकर घर के काम में लग जाती है। जल्दी से नाश्ता बना लेती हूं। कलावती आएगी तो सारा बर्तन निकाल दूंगी। रसोई भी साफ कर लेगी। फिर खाना बनाते बनाते मनीषा देखती है कि आलू नहीं है। ले अब सब्जी कैसे बनाऊं? इनको बोलती हूं आलू ले आए। मनीषा तुरंत संजय को आवाज देती है। अरे बाजार से आलू ले आई है ना। मुझे वैसे ही बहुत देर हो गई आज। संजय आश्चर्य होकर कहता है क्या इतनी जल्दी आलू खत्म हो गए? अरे

परसों ही तो 3 किलो आलू लाया था। इतनी जल्दी-जल्दी खत्म करोगी तब तो हो गया। अरे बर्बाद कर दोगी तुम तो ऐसे मुझे क्या बर्बाद करोगी? कोई और सब्जी है क्या घर में? पांच आदमी का तीन टाइम खाना बनता है। अब महीने भर चलेगा क्या? मुझे क्या है? मैं छोड़ देती हूं। आप बना लो खाना। अरे क्या हुआ? तुम दोनों सुबह से क्यों हल्ला करने लगते हो? मां जी मैं कहां कुछ बोलती हूं। अब आपके बेटे ही खाना बनाएंगी। इतना आलू कैसे लग गया पूछते हैं। ठीक है संजय तू रहने दे। मैं जाती हूं। बाजार ले आऊंगी सब्जी। अरे ठंड में नहीं खाएंगे तो कब खाएंगे बच्चे? मैं हरी सब्जी और बाकी सब

ले आऊंगी। झाड़े में जितना खाओगे ना उतना अच्छा है। तभी राज वहां आता है और कहता है दादी मुझे गाजर का हलवा खाना है। हां क्यों नहीं? चल तू अपनी दादी के साथ चल। दादी पुत्ता सैर भी कर लेंगे और सामान भी ले आएंगे। पुष्पा और राज बाहर चले जाते हैं। इधर कलावती काम करने के लिए आती है। भाभी पहले में घर की साफ सफाई कर देती है। हां हां कर ले एक काम तो हो जाए और फिर कपड़े धो लेना। कलावती पूरे घर में झाड़ू लगाती है। फिर मनीषा से कहती है भाभी जमीन पोछने के लिए क्लीनर दो ना। फिनल भी दो सफाई अच्छे से होएगी। अरे ये सब हमारे घर में नहीं आते। ऐसे ही

पानी से पोछा लगा दे। क्या भाभी यह सब क्या है? जमीन में सफाई कैसे आएगी तब? मैं कल खरीद के ले आएगी। हां हां ठीक है। कलावती पूरे घर में पोछा लगाकर कहती है भाभी मेरे को सर्प दे दो ना और साबुन भी मेरे हाथ के धोए कपड़े देखो एक बार पहन कर। अब खुद बोलगी क्या सफाई है तेरे कपड़े में कलावती। हां हां भाई ठीक है। मनीषा एक टुकड़ा साबुन का और एक चम्मच सर्व कलावती को देती है और कहती है देख थोड़ा-थोड़ा इस्तेमाल करना। यह नहीं कि एक ही दिन में पूरा साबुन खत्म कर देगी। भाभी इसमें है हीच क्या कुछ भी नहीं है। ऐसा है तो साबुन लगाने की जरूरत हीच क्या

है? अरे पगला गई है क्या? मैं इतने साबुन से पूरे हफ्ते कपड़े धो लेती हूं। कलावटी का मुंह खुला का खुला रह जाता है। भाभी तो भाभी धो सकती है। मैं ऐसे कपड़े नहीं धो सकती। गजब आदमी है आप लोग भाई। तू यह सब मत सुना। चुपचाप से कपड़े धो और थोड़ा साबुन बचा बचा कर। ठीक है। ठीक है। मैं सर्प वाला ही धो लेती हूं। बाकी साबुन अब रहने दो। कलावती सर्फ में कपड़े डुबो कर धोती है। इधर पुष्पा और राज सब्जियां लेकर घर आ जाते हैं। बहु आज आलू की सब्जी नहीं खानी मुझे। तो बांध गोभी और मटर की सब्जी बना लें और साथ में गाजर का हलवा भी बना लेना। ठीक है मम्मी

जी। मनीषा कलावती से कहती है कलावती तू जल्दी से गोभी गाट दे तब तक मैं गाजर घिस लेती हूं। ठीक है भाभी। कलावती पत्ता गोभी पूरी काटने लगती है। तो मनीषा उसे देखकर तुरंत टोकते हुए कहती है। अरे अरे रे ये क्या पूरा नहीं काटना है। थोड़ा सा काट कर छोड़ दे। भाभी आधे में इतने लोगों का खाना कैसे होएगा? अरे आराम से हो जाएगा। ऊपर से दोपहर का भी हो जाएगा। क्या आप लोग खाना खाते हो या सिर्फ सुनते हो? अरे खाते हैं। आज तेरा पहला दिन है ना तू देख लेना कैसे खाते हैं हम लोग। कलावती आश्चर्य में पड़ जाती है और सोचती है पहला ऐसा घर देखला है मैंने जो ऐसा है। इतनी

कंजूसी आदमी खुद खाता भी नहीं है। कलावती अपना काम करके बैठ जाती है और इधर मनीषा खाना तैयार करके सबको देती है और साथ में कलावती को भी देती है। कलावती के थाली में दो छोटी-छोटी रोटी, थोड़ी सी सब्जी और साथ में गाजर का हलवा था। इतनी छोटी-छोटी रोटी एक निवाले में खत्म हो जाएगी। इसमें तो घी भी नहीं लगेला है। सब्जी लग रहा है कि बीच नहीं है। गाजर का हलवा एकनी वाला जितना है। ऐसा खाना खाकर अब किसका पेट भरेगा? किसका क्या तेरा भरेगा? भाभी रोटी बिना घी के मैं ही नहीं खाती। अरे लगाया तो है। अब क्या घी बहा दूं? किधर है घी? दिखेच नहीं रहला है। अचार दे

दो। सब्जी तो आपने दी नहीं। मनीषा घी की कटोरी लाती है। उसमें टूथपिक डुबोकर कलावती को दिखाती है। देख मैंने लगाया था इससे। समझी? इससे लगाया। तभी बहुत ज्यादा लग गया। मेरी रोटी तो रहने हीच दो अब। कलावती खाना खाकर जाने लगती है। तभी मनीषा उसे रोकते हुए कहती है, अरे कलावती अभी कहां जा रही है? बर्तन तो धो ले पहले। कलावती बर्तन धोने के लिए जाती है। भाभी बर्तन धोने के लिए साबुन तो दो। इधर तो साबुन भी नहीं है, सर्फ भी नहीं है। क्या? एक बट्टा साबुन तो मैंने महीने भर पहले ही तुम्हें दिया था रसोई में। इतनी जल्दी खत्म कैसे हो गया?

लो। मैं यहां महीने भर चलाती हूं तो सबको दिक्कत होती है। अरे तो क्या अब एक दिन में खत्म कर दूंगी? भाभी साबुन दे रही हूं ना। या फिर मैं बर्तन छोड़ दूं। अरे भाई बर्तन छोड़ देगी तो फिर तुझे रखा ही क्यों है? तुम दोनों अपना हिसाब किताब बाद में करना। अभी इसको साबुन दे दो पहले। संजय गुस्से में कलावती को एक साबुन देकर कहता है देख कर चलाना। यह नहीं कि बहा दो। अब बर्तन धोने में जो लगेगा उतना तो लगेगा ही ना। बोलो तो पानी से धोकर रख देगी। तुम अपना काम करो कलावती। जुबान मत चलाओ। कलावती बर्तन धोकर वहां से चली जाती है और एक ही दिन में पूरी चिड़चिड़ा जाती है। इस

तरह से इनकी इधर काम नहीं करेगी मैं। कुछ ना कुछ तो करना हीच पड़ेगा मेरे को। पगला देंगे यह लोग। कलावती शाम को काम पर नहीं जाती। इधर मनीषा पूरे टेंशन में आ जाती है और पुष्पा उनसे कहती है यह क्या है बहू? तूने तो कहा था मां जी मैंने सिर्फ 2000 में काम वाली रखी है। बचत देखो कैसे की मैंने। ऐसी बचत तो कोई भी कर लेगा। एक दिन हुआ नहीं उसके नखरे शुरू। अब क्या बिठाने के पैसे दोगी उसे? अरे नहीं नहीं मां जी मैं कल उसकी सारी नसें टाइट करती हूं। अब देखिए अगले दिन मनीषा कलावती से कहती है कलावती ये क्या है? एक दिन हुआ नहीं और तू

नखरे करने लगी। एक टाइम किया और दूसरे टाइम गायब। भाभी मैं आपके साबुन और सरफ बचा ले रही थी। अब मेरे को क्या है? अब बोलेगी तो मैं आ जाएगी। अच्छा ऐसा क्या? बचत की चिंता तू मत कर कलावती काम पे आजा। बाकी मैं देख लूंगी क्या है क्या नहीं। ठीक है। मेरे को किया है। इतने में पुष्पा आकर कलावती से कहती है कलावती पहले मेरी साड़ी धोकर इसे आयरन कर दे। मुझे आज शाम को पहननी है। और हां अच्छे से धोना। कल जो कपड़े तुमने धोए थे बिल्कुल गंदे थे। अब मैं क्या करेगी? यहां किसी के हाथ से सर्प और साबुन छूटता ही नहीं है। तो मैं क्या करेगी? बोलो। किसी का मुझे नहीं पता

मेरे कपड़े अच्छे से धो। कलावती बाथरूम में देखती है कि शैंपू रखा है। वो चुपचाप से बहुत सारा शैंपू पुष्पा की साड़ी में डाल देती है और उससे कपड़े धोती है। तभी अंजलि नहाने जाती है और शैंपू देखती है। मम्मी मैं जब भी नहाने के लिए जाती हूं शैंपू खत्म ही रहता है। क्या है बे? तुम लोग दिन में कितनी बार माथा धोती हो जो एक हफ्ते में इतनी बड़ी बोतल शैंपू की खाली कर दी भैया इतनी सी शैंपू है इसमें आप लोग इतना बोल रहे लेले इतना तो मैं ही इस्तेमाल कर लेती वो भी अकेले एक हफ्ते में तुम हमारे घर के मैटर में मत बोलो कलावती वरना तुम्हारी छुट्टी कर दूंगा

कलावती का दिमाग खराब हो जाता है और वो वहां से गुस्से में चली जाती है मेरे को निकालेंगे इन लोगों को मैं सबक सिखा खाती है। कलावती रसोई में जाती है और मनीषा से कहती है, भाभी मैं क्या बोल रही थी? सब्जी खरीद के लाने में इतना पैसा लगता है। बचत करना है तो हम लोग एक काम कर सकते हैं। क्यों ना हम सब्जी घर पर ही चुगा ले। अरे वाह कलावती। तू तो बहुत तेज निकली। आखिर तू भी हम लोगों की तरह हो गई ना। एकदम कंजूस। भाभी मैं रोटी सेक दी है। अब जाओ अंजली और राज को ना स्कूल भेज दो। मनीषा अपने कमरे में चली जाती है और कलावती इधर सब्जी में

मरी हुई छिपकली डाल देती है। स्कूल भेजकर जैसे ही मनीषा आती है सब्जी देखती है तो मनीषा के होश उड़ जाते हैं। ये क्या हो गया कलावती? अब कोई कैसे खाएगा? तुमने देखा नहीं क्या? भाभी मैं क्या देखती? आपने सब्जी ढक कर रख ली थी। मैं तो रोटी बना ले ली थी। संजय और पुष्पा को जैसे ही यह बात पता चलती है, संजय कहता है, लो हो गया नुकसान सुबह-सुबह। अब दोबारा खाना मत बनाना। हम भूखे ही रह जाएंगे। ठीक है। कलावती खुश हो जाती है। बाकी सारे काम छोड़कर वो चली जाती है। शाम को कलावती मनीषा और पुष्पा से कहती है चलिए भाभी सब्जी उगाते ताकि हम बिना सोचे जितना मन

करे उतना सब्जी तो बना सकेंगे। हां हां मैं भी चलती हूं। पैसे भी इस महीने मेरे बेटे का खर्च बहुत बढ़ गया है। ऊपर से कलावती के पैसे भी निकालने होंगे। मां जी इसीलिए तो मैंने यह सब करने का सोचा है। चलिए ना चलते हैं ना। अरे छत पर नहीं घर के पीछे वाली जमीन पर यह सब करेंगे ताकि ज्यादा सब्जी हो और हम लोग बेचकर कुछ कमा भी सके। अरे वाह हमने तो सोचा भी नहीं था कि हम यह कर सकते हैं। मनीषा पुष्पा और कलावती घर के पीछे वाली जमीन पर चली जाती है और गोभी, मटर और गाजर रोकती है। अब महीने भर में मैं भी कमाने लगूंगी। हां भाभी और नहीं तो क्या भैया क्या ही बिजनेसमैन

बनेंगे अपुन को मत दे देना यह तरकीब मेरी है कमाई मेरी है अब जिसकी भी होगी तो गिरेगी दाल मिर्च ना मां जी पैसे तो घर पर ही जाएंगे ना मनीषा और पुष्पा पैसे के ख्याल में गुम हो जाती है और कलावती बिना काम किए 9 2 11 हो जाती है रात को जैसे ही संजय घर आता है तो ये लो टमाटर पर बहुत महंगा है भाई। ₹40 किलो। मैंने एक पांव ले लिया। अब हफ्ते भर कुछ नहीं लाऊंगा मैं। अब लाने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी। अब हम अपना खुद का काम कर लेंगे। मनीषा संजय को सारी बात बताती है। संजय खुश हो जाता है और मन ही मन सोचता है। अब कोई टेंशन नहीं होगी। अब चावल और गेहूं

भी इसी में उगा लेंगे। फिर मुझे राशन पाने की कोई टेंशन ही नहीं होगी। जितना कमाऊंगा सब जमा कर लूंगा। संजय फिर सबके साथ में रात का खाना खाता है। तभी राज कहता है मम्मी मुझे हेयर जेल चाहिए ताकि मेरे बाल अच्छे से लग सके। अच्छा ऑब्वियसली ये सब चाहिए। जब कमाओगे तब पता चलेगा बेटा। खर्च कम करने का सोचता हूं मैं और ये लोग बढ़ा देते हैं। ऐसी कोई खेती नहीं है जिससे सिर्फ साबुन ही उपज है। क्या पापा आप भी? संजय रात को ही घर के पीछे वाली जमीन पर जाता है और जगह देखने लगता है ताकि वह और चीजों की खेती भी कर सके। अगले दिन सुबह-सुबह संजय उठकर खेती

में लग जाता है। संजय को देखकर मनीषा और पुष्पा भी उसी में लग जाते हैं। अरे तुम दोनों यहां क्यों आ गए? मुझे मेरा काम करने दो। यह क्या बात हुई? हमने यह चालू किया है। यह हम दोनों का बिजनेस है। अब इसमें क्या मेरा क्या तुम्हारा सब हमारा ही तो है। सोचो अगर हम सब इसमें लग जाएंगे तो कितनी कमाई होगी। हां, यह तो हमने सोचा ही नहीं। सच में यह ख्याल हमें क्यों नहीं आया था। संजय और उसका परिवार कंजूसी की हद पार कर चुके थे। लेकिन कलावती की इस तरकीब में वह लोग फंस जाते हैं। अब धीरे-धीरे पूरा घर खेत में ही लग जाता है। इधर कलावती आराम से घर में

आती और अपने मनमर्जी का काम करके चली जाती। दिन बीतने लगते हैं। एक रोज संजय अपने दुकान में बैठा सोच रहा था। अभी पोष का महीना है और बाजार भी नहीं है। एक काम करता हूं स्टाफ को हटा देता हूं। बाद में रख लूंगा। संजय अपनी कंजूसी के कारण स्टाफ को हटा देता है और दिन भर अब खेती में लगा रहता है। एक रोज पुष्पा संजय से कहती है संजय बेटा तू दुकान में ध्यान नहीं देता। दुकान नियमित खुलनी चाहिए। मां दुकान में ग्राहक नहीं है अभी तो। उससे अच्छा है कि हम लोग खेती पर ध्यान दें। इधर से कमाई कर ले। बचत करने से मतलब है ना चाहे कहीं से

भी करें। बेटा तू बिल्कुल बाऊजी पर क्या है। बिल्कुल उनकी तरह बचत करता है। मां मुझे तो उनसे भी आगे निकलना है। मनीषा अपने घर का काम और संजय अपने दुकान को छोड़कर खेती में ही लगे रहते हैं दिन भर। खेती की समझ ज्यादा ना होने के कारण मनीषा और संजय अपना-अपना दिमाग लगाने लगते हैं और इधर कलावती की मौज हो जाती है। भाभी क्या बात है। आपने तो गजब कर दिया। अब क्या किसानों को मात देगी क्या अब? अब कोर भैया को देखकर लग रहेला है। अब लोग कितने दिनों से खेती कर रहे हैं। लगता है अच्छी खासी कमाई होगी। मैं बोल देती मेरी पगार बढ़नी चाहिए

मैंने बहुत मदद करी है आपकी दिमाग तो ठीक है ना तुम्हारा जाओ देखो अपने पगार की बात करती हो 2000 कोई कम नहीं है मैं तो इतने में तुम्हें कभी रखता ही नहीं यह तो मनीषा है जिसने तुम्हें रख लिया अब ज्यादा बोलोगे तो तुम्हें निकाल दूंगा काम से आवती चिरमरा के वहां से निकल जाती है और कहती है अब तुम्हारी कंजूसी से ही कैसे तुम लोगों का बुरा हाल करती है देखो कलावती से पंगा लेना बहुत भारी पड़ेगा तुम लोगों को। कलावती खून के घूंट पीकर रह जाती है और इसी तरह से महीना बीत जाता है लेकिन कोई भी सब्जी नहीं उगती और खेती के चक्कर में

संजय की दुकान भी पूरी तरह से ठप हो जाती है। बराबर से पानी भी दिया था और टाइम टाइम पर खाद भी दिया था। किसान को बुलाकर लाती है। अम्मा जी ऐसा है पानी तो दिया आप लोगों ने। लेकिन कंजूसी गर्दी देने में अब खुराक की पर्याप्त नहीं होगी तो फसल कैसे उगेगी? अम्मा खेती में तो कंजूसी छोड़ दो। यह कंजूसी आदमी को रोड पर ले आती है। जैसे कि आपके और आपके परिवार को ले आई। कलावती तुमने बताया नहीं था क्या इन लोगों को इस सब के बारे में? अब मैं क्या बताती यह लोग कंजूसी छोड़ने को तैयार ही नहीं है तो मैं क्या करेगी इसमें? आए बड़े कलावती को काम

से निकालने वाले। अरे कलावती खुद ही काम छोड़कर जा रही है। कलावती मनीषा के घर का काम छोड़कर चली जाती है और संजय और उसका पूरा परिवार माथे पर हाथ रखकर बैठ जाता है। यह सब कलावती का किया हुआ है। मैंने अपनी कंजूसी के कारण अपनी दुकान खोली। यह क्या किया मैंने? चलो मैं चलता हूं। हाय रे कंजूसी भाई। संजय और उसके घर वाले पछते रह