पार्किंग में पहुँच कर जैसे ही स्नेहा ने अपनी छः साल की बेटी कुहू के लिए कार का बैक डोर खोला, वह मुँह चढ़ा कर फ्रंट डोर के सामने जा खड़ी हुई।

“कुहू बच्चे पीछे बैठते हैं, वहाँ मम्मा बैठेगी।” स्नेहा समझाते हुए बोली मगर कुहू कहाँ सुनने वाली थी। उसका गोलू सा मुँह फूल कर और कुप्पा हो गया। कुहू का रुआंसा चेहरा देख मयंक ने भीतर से अपनी बगल वाली सीट का दरवाज़ा खोल दिया। “पप्पा के साथ बैठना है प्रिंसेस को…आ जा” और वो छलांग लगाकर बैठ गई। बैठते ही उसने कार के म्यूजिक सिस्टम पर अपनी मनपसंद नर्सरी राइमस् लगा दी। रोज़ की तरह आज भी स्नेहा को पीछे बैठकर संतोष करना पड़ा।

हफ्ते भर से ये इस छोटे से परिवार का रोज़ का रूटीन हो गया था। डिनर के बाद कुहू का आइसक्रीम के लिए ज़िद करना, स्नेहा का सर्दी का हवाला दे कर मना करना और मयंक का दोनों के बीच में आकर यह कहते हुए कुहू की ज़िद मान लेना, “आइसक्रीम तो पप्पा को भी खानी है…”

बैक सीट पर बैठी स्नेहा दोनों को हँसते-गुनगुनाते देख रही थी मगर वो चाह कर भी उनका हिस्सा नहीं बन पा रही थी। आजकल अज़ीब सी जलन महसुस करने लगी थी वो…कुहू के लिए…अपनी बेटी के लिए! ये एक ऐसा ख़याल था जो उसे भीतर ही भीतर शर्मिंदा भी कर रहा था मगर वो करे भी तो क्या! कैसे नकारे मीठे मातृत्व की ओट से लुकाछिपी खेल रही इस कसैली भावना को?

स्नेहा आजकल कुछ ज़्यादा ही नोटिस कर रही थी कि मयंक जब-तब कुहू की हर सही-गलत ज़िद के आगे सहजता से झुकने लगा था… और जब जब ऐसा होता, स्नेहा अतीत के उन गलियारों में भटकने चली जाती जहाँ छोटी स्नेहा कोई गलती या ज़िद करने के बाद अपने पिताजी के सामने अपराधिनी बनी खड़ी होती और वे उसे आँखें चौड़ी कर तेज़ आवाज़ में डाँट रहे होते।

उसे याद ही नहीं है कि कभी उसने अपने पिताजी का चेहरा नार्मल और हंसते हुए देखा हो… हमेशा ‘ये करो, ये नहीं करो’ की पट्टी पढ़ाते, अनुशासन का ढोल बजाते, जरा जरा सी गलतियों पर डाँटते और मम्मी को सुनाते, ‘लड़की को ज़रा तमीज़ सिखाओ, इसे अगले घर जाना है…’ पिता के सामने स्नेहा ना कभी अपने मन की कह पाई, ना ही कर पाई। शुष्क हवाओं के बीच जैसे-तैसे ये बेल परवान चढ़ी और एक दिन ससुराल की क्यारी में रौप दी गई।

सख़्त परवरिश के असर से हर काम तमीज़ से करना, समय पर करना और अपनी हद़ में रहना स्नेहा के खून में आ गया था। मंयक अच्छा पति था। वो हर वह काम करता था जो अच्छे पति किया करते हैं मसलन घर की जरूरतों का ख्याल रखना, कभी कभी स्नेहा को सिनेमा, डिनर पर ले जाना, बर्थ डे-ऐनीवर्सरी पर गिफ्ट देना…आदि।

दोनों में कभी किसी बात पर मतभेद नहीं हुए क्योंकि घर वैसे ही चल रहा था जैसे मयंक चाहता था। कार में वो ही गाने चलते थे जो मयंक ट्यून करता था। उसके हर निर्णय में स्नेहा की मौन स्वीकृति रहती।

सब कुछ सही चल रहा था। मगर उसकी बेटी ने, उसके भीतर दम तोड़ चुकी उस छोटी स्नेहा को फिर से जिंदा कर दिया था जिसे कुहू का बात-बात पर जिद़ करना अच्छा नहीं लगता था… और उससे भी ज्यादा बुरा लगता था उसके पापा का हर बार उसके सामने ख़ुशी ख़ुशी झुक जाना।

स्नेहा को यकीन नहीं होता था कि पिता ऐसे भी हो सकते हैं! वह यह देख कर हैरान रह जाती थी कि यह वही मयंक है जिसे हर काम अपने मन मुताबिक करने की आदत है, जो किसी के लिए अपना रूटिन नहीं बदल सकता…मगर कुहू के सामने कैसा मोम सा पिघला रहता, वो जैसा चाहती, प्यार से ढल जाता।

आज रविवार था। लंच के वक्त स्नेहा ने अपनी और मयंक की थाली लगा ली। कुहू को एक कटोरे में दाल-चावल मिला कर दे दिये।

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(कहानी का शेष भाग)

कुहू ने कटोरे की तरफ देखा तो उसकी नाक-माथे पर सिलवटें पड़ गईं। “मुझे ये नहीं चाहिए! मुझे परांठे चाहिए!” उसने ज़िद भरे स्वर में कहा।

स्नेहा ने आवाज़ में दृढ़ता लाते हुए कहा, “नहीं कुहू, रोज़ परांठे नहीं बनते। यही खाओ।”

कुहू ने कटोरा धक्का दे दिया और रोते हुए सीधे अपने पिता के पास भागी, जो सोफे पर अखबार पढ़ रहे थे। “पप्पा…मम्मा ने मुझे यह खाने को दिया है…मुझे तो परांठे चाहिए…”

मयंक ने अखबार नीचे रखा। स्नेहा की तरफ देखा, फिर कुहू के आंसू पोंछे। “ऐसे नहीं रोते प्रिंसेस। चलो, पप्पा तुम्हारे लिए परांठा बनाते हैं।” और वह उसे गोद में उठाकर रसोई की तरफ चल दिया।

स्नेहा वहीं खड़ी रह गई, अपनी लगाई हुई थाली देखती रही। उसका गला भर आया। यह दृश्य रोज़ का हो गया था। वह कुछ कहना चाहती थी, मगर शब्द गले में अटक जाते। उसने चुपचाप अपनी थाली उठाई और खाना शुरू किया, हालाँकि उसे स्वाद कुछ भी महसूस नहीं हो रहा था।

रसोई से आवाज़ आ रही थी। मयंक परांठे बना रहा था और कुहू हँस-हँस कर उसके साथ बातें कर रही थी। “पप्पा, आप दुनिया के सबसे अच्छे पापा हो!” कुहू ने कहा।

“और मम्मा?” मयंक ने पूछा।

“मम्मा…मम्मा तो हमेशा ‘नहीं’ कहती हैं,” कुहू ने बेफिक्री से जवाब दिया।

स्नेहा का कांटा हाथ से छूट कर प्लेट पर गिरा। उसकी आँखें छलछला आईं। क्या वह सचमुच सिर्फ ‘नहीं’ कहने वाली माँ थी? क्या उसके पास प्यार जताने का कोई और तरीका नहीं था? वह जिस अनुशासन और तमीज़ को अपनी परवरिश का सबसे बड़ा गुण मानती थी, आज उसी ने उसे अपनी बेटी से इतना दूर कर दिया था?

वह उठी और धीरे से बालकनी में आ गई। ताज़ी हवा के झोंकों ने उसके चेहरे के आँसू सुखा दिए, मगर दिल का बोझ हल्का नहीं हुआ।

 

उस रात, जब कुहू सो गई, स्नेहा ने मयंक से बात करने का निश्चय किया। वह लिविंग रूम में आई, जहाँ मयंक टीवी देख रहा था।

“मयंक…कुछ बात करनी है,” स्नेहा ने धीमे स्वर में कहा।

मयंक ने रिमोट रख दिया और उसकी तरफ देखा। “क्या बात है? तुम आज शाम से चुपचाप रही हो।”

“यह कुहू के बारे में है…और…हमारे बारे में,” स्नेहा ने कहा, शब्दों को सावधानी से चुनती हुई। “मैं देख रही हूँ कि तुम उसकी हर ज़िद पूरी करते हो, चाहे वह गलत ही क्यों न हो। क्या तुम्हें नहीं लगता कि इससे उसे बिगाड़ रहे हैं?”

मयंक ने गहरी सांस ली। “स्नेहा, मैं समझता हूँ कि तुम क्या कहना चाह रही हो। मगर देखो, मेरी अपनी एक कहानी है। मेरे पिता बहुत सख्त थे। उनके सामने मैं कभी अपनी मन की बात नहीं कह पाया। हमेशा डर लगा रहता था कि गलती हो गई तो डाँट पड़ेगी। मैं नहीं चाहता कि मेरी बेटी भी उसी डर के साथ बड़ी हो।”

स्नेहा चौंकी। यह पहली बार था जब मयंक ने अपने बचपन के बारे में इतनी गहराई से बात की थी।

मयंक ने आगे कहा, “मैं जानता हूँ कि तुम सही कह रही हो, अनुशासन ज़रूरी है। मगर प्यार और स्नेह दिखाना उससे कहीं ज़्यादा ज़रूरी है। कुहू को यह एहसास होना चाहिए कि उसके माता-पिता उससे बिना शर्त प्यार करते हैं, चाहे वह गलती करे या सही।”

स्नेहा की आँखें फिर भर आईं। “पर मुझे डर लगता है मयंक। मैं जिस तरह बड़ी हुई हूँ, उसने मुझे सिखाया है कि प्यार जताने का तरीका सिर्फ नियम बनाना और उनका पालन करवाना है। मैं नहीं जानती कि वैसा प्यार कैसे दूँ जैसा तुम देते हो। मुझे लगता है कुहू मुझसे दूर होती जा रही है।”

मयंक ने स्नेहा का हाथ अपने हाथों में लिया। “तुम दूर नहीं हो। तुम एक अद्भुत माँ हो। बस…थोड़ा ढीला छोड़ो। कुहू को तुम्हारे प्यार की ज़रूरत है, सिर्फ अनुशासन की नहीं। हम दोनों मिलकर संतुलन बना सकते हैं।”

अगले दिन, जब कुहू ने फिर आइसक्रीम की ज़िद की, तो स्नेहा ने गहरी सांस ली। उसने पहले की तरह सर्दी का हवाला नहीं दिया। बल्कि, वह मुस्कुराई और बोली, “ठीक है, लेकिन एक छोटी आइसक्रीम, और उसके बाद गर्म दूध पीना होगा, ठीक है?”

कुहू की आँखें चमक उठीं। “जी मम्मा! धन्यवाद!”

स्नेहा ने आइसक्रीम निकाली। फिर, अचानक ही उसके मन में आया। उसने तीन चम्मच निकाले। “चलो, आज हम सब साथ में खाएंगे। पप्पा को भी बुलाते हैं।”

कुहू खुशी से उछल पड़ी। तीनों लिविंग रूम में बैठे, और आइसक्रीम के छोटे-छोटे कौर खाते हुए कुहू ने स्कूल की मजेदार कहानियाँ सुनानी शुरू कर दीं। स्नेहा ने देखा कि मयंक उसे गर्व भरी नज़रों से देख रहा था।

उस पल स्नेहा को एहसास हुआ कि उसकी अपनी कमियों और डर को स्वीकार करना ही पहला कदम था। वह अपने अतीत को नहीं बदल सकती थी, मगर अपनी बेटी के वर्तमान और भविष्य को ज़रूर बेहतर बना सकती थी। अनुशासन और प्यार के बीच का वह संतुलन कोई रेसिपी नहीं थी जो उसे याद थी, बल्कि एक नई राह थी जिसे उसे अपनी बेटी के साथ मिलकर बनाना था।

और आज, पहली बार, उसे विश्वास हुआ कि वह यह कर सकती है।