मेरी शादी को तीन साल हो चुके थे, लेकिन मेरा पति हर रात अपनी माँ के कमरे में सोता था। एक रात मैंने चुपके से उसका पीछा किया… और जो सच्चाई मैंने जानी, उस पर मुझे गहरा पछतावा हुआ…

शादी के दिन से ही प्रिया खुद को दुनिया की सबसे भाग्यशाली औरत मानती थी।
उसका पति — अरुण — एक सज्जन व्यक्ति था, नियमित रूप से काम पर जाता था, शांत स्वभाव का लेकिन बेहद संवेदनशील।

लोग अक्सर कहते थे:
“प्रिया बहुत भाग्यशाली है, उसे ऐसा पति मिला है।”

लेकिन शादी के कुछ ही हफ्तों बाद, उसे कुछ अजीब-सा महसूस होने लगा।

हर रात, जैसे ही प्रिया गहरी नींद में जाने लगती, अरुण चुपचाप बिस्तर से उठता, दबे पाँव कमरे से बाहर निकलता और अपनी माँ — साविता — के कमरे की ओर चला जाता, जो कई वर्षों से विधवा थीं।

शुरुआत में, प्रिया खुद को समझाती रही कि उसका पति बस अपनी बुज़ुर्ग माँ से मिलने जाता है, शायद उन्हें रात में अकेलेपन का डर लगता हो।

लेकिन हर रात — चाहे बारिश हो, तेज़ हवा हो या दिल्ली की ठंडी रातें — अरुण बिस्तर छोड़कर अपनी माँ के कमरे में ही जाता।

जब प्रिया ने उससे पूछा, तो अरुण हल्की-सी मुस्कान के साथ बोला:
“माँ को रात में अकेले डर लगता है, चिंता मत करो।”

तीन साल बीत गए, लेकिन उसकी यह आदत ज़रा भी नहीं बदली।

धीरे-धीरे प्रिया उस घर में एक गैरज़रूरी इंसान बनती जा रही थी।

कई बार उसकी सास ताने में कहतीं:
“जो आदमी अपनी माँ से प्यार करना जानता है, वही बहू के लिए वरदान होता है।”

प्रिया बस असहज-सी मुस्कान के साथ चुप रह जाती।

बाहर की दुनिया में अरुण एक आदर्श, आज्ञाकारी बेटा था, लेकिन भीतर ही भीतर प्रिया बेचैन होती जा रही थी।

एक रात, जब उसे नींद नहीं आ रही थी, उसने घड़ी की ओर देखा — रात के 2 बजे थे।

फिर वही जानी-पहचानी पदचाप की आवाज़।

अरुण चुपचाप कमरे से बाहर निकल गया।

प्रिया ने धीरे से दरवाज़ा खोला, लाइट बंद की और बिना आवाज़ किए गलियारे में आगे बढ़ी।

सास के कमरे से आती हल्की-सी रोशनी दरवाज़े की दरार से झलक रही थी।

फिर दरवाज़ा बंद हो गया।

उसने दरवाज़े से कान लगा दिए, दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। 
अंदर से साविता की काँपती हुई आवाज़ गूँजी: …

अंदर से साविता की काँपती हुई आवाज़ गूँजी—

“अरुण… आज फिर वही सपना आया। तुम्हारे पिता… वे फिर मुझे लेने आए थे।”

यह सुनते ही प्रिया का दिल जैसे एक पल के लिए रुक गया।
उसने सोचा था कि वह कोई ऐसी बात सुनेगी जो उसके शक को सही साबित कर दे—कोई गुप्त प्रेम, कोई अनैतिक रिश्ता, या कोई ऐसा सच जो उसके वैवाहिक जीवन को पूरी तरह तोड़ दे।
लेकिन जो उसने सुना… वह कुछ और ही था।

अरुण की आवाज़ बहुत धीमी थी, लेकिन उसमें गहराई और थकान साफ़ झलक रही थी।
“माँ, वो सिर्फ़ सपना था। पापा अब नहीं हैं। मैं यहीं हूँ… आपके पास।”

साविता सिसक पड़ीं।
“तुम नहीं समझते, अरुण। जब रात को अंधेरा होता है, तो मुझे लगता है मैं फिर उसी दिन में लौट गई हूँ। वो एक्सीडेंट… खून… चीखें… और फिर तुम्हारे पिता की लाश। मैं अकेली रह जाती हूँ उस कमरे में।”

प्रिया की आँखें भर आईं।
उसे पहली बार एहसास हुआ कि उसकी सास की कठोरता, ताने और ठंडापन शायद घमंड से नहीं, बल्कि डर से पैदा हुए थे।

साविता ने काँपती उँगलियों से अरुण का हाथ थाम लिया।
“जब तुम यहाँ होते हो, मुझे लगता है जैसे मैं ज़िंदा हूँ। जैसे मैं फिर से सुरक्षित हूँ।”

अरुण ने गहरी साँस ली।
“माँ, मैं आपकी वजह से ही मज़बूत बना हूँ। लेकिन… प्रिया भी मेरी ज़िम्मेदारी है।”

यह वाक्य सुनते ही प्रिया के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
उसने पहली बार महसूस किया कि अरुण सिर्फ़ एक आज्ञाकारी बेटा नहीं, बल्कि एक फँसा हुआ इंसान है—दो रिश्तों के बीच।

साविता अचानक चुप हो गईं।
कुछ पल बाद उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा—
“क्या… क्या उसने कुछ देख लिया?”

अरुण चौंक गया।
“किसने?”

“प्रिया,” साविता ने आँखें बंद किए हुए कहा।
“मुझे पता है… वो दुखी है। मैं देखती हूँ उसकी आँखों में खालीपन। मैं जानबूझकर ताने देती हूँ, ताकि वो मुझसे नफ़रत करे… ताकि उसे मेरे लिए दया न आए।”

यह सुनकर प्रिया का दिल टूट गया।

अरुण की आवाज़ भर आई।
“माँ, आप ऐसा क्यों करती हैं?”

“क्योंकि अगर वो मुझसे प्यार करेगी,” साविता ने रोते हुए कहा,
“तो मेरी बीमारी उसे तोड़ देगी।”

प्रिया का दिमाग़ सुन्न हो गया।
बीमारी?

अरुण धीरे से बोला—
“माँ, डॉक्टर ने कहा था… ये बात छुपानी नहीं चाहिए।”

साविता ने आँखें खोलीं।
“नहीं! मैं नहीं चाहती कि वो मेरे कारण इस घर में बंधी रहे। मैं नहीं चाहती कि वो अपनी ज़िंदगी मेरे डर और मेरी यादों के साथ गुज़ारे।”

प्रिया अब और नहीं सह पाई।

उसने दरवाज़ा खोल दिया।

चरमराहट की आवाज़ से दोनों चौंक गए।

प्रिया अंदर आई।
उसका चेहरा पीला था, आँखों में आँसू, लेकिन आवाज़ बेहद स्थिर।

“माँ… और कब तक आप सब कुछ अकेले सहती रहेंगी?”

साविता की आँखें फैल गईं।
“त–तुम…?”

अरुण घबरा गया।
“प्रिया, मैं समझा सकता हूँ—”

“नहीं,” प्रिया ने उसे रोक दिया।
“आज पहली बार, मुझे सब समझ में आया है।”

वह साविता के पास जाकर ज़मीन पर बैठ गई, ठीक उनके सामने।
“आप मुझे कमज़ोर समझती थीं, है ना? इसलिए ताने देती थीं? ताकि मैं आपसे दूर रहूँ?”

साविता फूट-फूटकर रो पड़ीं।
“मैंने तुम्हें बचाने की कोशिश की थी…”

प्रिया ने उनका हाथ पकड़ लिया।
“और आपने मुझे तोड़ दिया।”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

कुछ देर बाद प्रिया ने गहरी साँस ली और कहा—
“तीन साल… तीन साल मैंने खुद को बेकार समझा। लगा कि मैं पत्नी होने के लायक नहीं हूँ। लेकिन आज मुझे पता चला—गलती मेरी नहीं थी।”

उसने अरुण की ओर देखा।
“और गलती तुम्हारी भी नहीं थी।”

अरुण की आँखों से आँसू गिर पड़े।
“प्रिया… मैं डरता था। अगर मैं माँ को अकेला छोड़ दूँ और कुछ हो जाए—”

“और अगर मुझे खो दो तो?” प्रिया ने शांत स्वर में पूछा।

अरुण चुप हो गया।

साविता ने काँपती आवाज़ में कहा—
“मैंने तुम्हारे पिता को खोया है, अरुण। मैं नहीं चाहती कि प्रिया तुम्हें खो दे।”

यह पहली बार था जब साविता ने उसे ‘तुम’ कहकर पुकारा।

अगले कुछ महीनों में सब कुछ बदल गया।

साविता का इलाज शुरू हुआ—पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर।
पहली बार उन्होंने स्वीकार किया कि उन्हें डर लगता है, कि उन्हें मदद चाहिए।

अरुण ने थेरेपी ली।
उसने सीखा कि प्यार का मतलब खुद को मिटा देना नहीं होता।

और प्रिया…
उसने पहली बार अपने लिए आवाज़ उठाई।

घर में नए नियम बने।
रात में अरुण अपनी पत्नी के साथ रहता, और ज़रूरत पड़ने पर साविता के कमरे में नाइट लैंप और कॉल बेल लगाई गई।

धीरे-धीरे साविता ने अकेले सोना सीख लिया।

एक दिन, साविता ने प्रिया से कहा—
“मैं तुम्हें अपनी बहू नहीं… अपनी बेटी मानती हूँ।”

प्रिया मुस्कराई।
उस मुस्कान में दर्द भी था, और सुकून भी।

तीन साल बाद, उसी घर में एक बच्ची की किलकारी गूँजी।

साविता ने उसे गोद में लेते हुए कहा—
“अब मुझे रात में डर नहीं लगता।”

और प्रिया ने मन ही मन सोचा—
कुछ सच्चाइयाँ देर से सामने आती हैं…
लेकिन जब आती हैं, तो ज़िंदगी बदल देती हैं।

सबसे बड़ा सबक यही था:
खामोशी हमेशा त्याग नहीं होती—कभी-कभी वह ज़हर बन जाती है।
और प्यार…
प्यार में अगर सच न हो, तो वह सबसे बड़ा धोखा बन जाता है।