मैं रोज़ से थोड़ा जल्दी घर आ गई—और देखा कि मेरे पति हमारे बेटे की गर्लफ्रेंड के साथ बैठे हैं। और जब उसने फुसफुसाकर कहा, “मुझे तुमसे कुछ कहना है,” तो मुझे एहसास हुआ कि वह सुबह मेरे परिवार के बारे में मेरी सारी सोच को उलट-पुलट कर देने वाली थी।

मुझे लगता था कि मैं अपने परिवार को पूरी तरह समझ गई हूँ। शादी के बीस साल से ज़्यादा समय के बाद, मुझे लगता था कि कोई बड़ा राज़ नहीं बचा है—बस रोज़ के काम और छोटे-मोटे बदलाव हैं। वह सोच उस सुबह टूट गई जब मैं जल्दी घर आई, अपना बैग दरवाज़े पर रखा, और अपने पति को लिविंग रूम में एक जवान औरत से धीरे से बात करते सुना—और वह औरत मैं नहीं थी।

मेरा नाम नैना शर्मा है। मैं अपने पति, करण शर्मा के साथ जयपुर, राजस्थान में रहती हूँ। करण एक शांत और गंभीर आदमी है जो एक पब्लिक हाई स्कूल में मैथ पढ़ाता है। हमारे दो बड़े बच्चे हैं—हमारा बेटा, रोहित, और हमारी बेटी, अनन्या, जो बहुत छोटी उम्र में हमारी ज़िंदगी में आई थी और हमने उसे गोद ले लिया था।

और फिर है ईशा।

ईशा वर्मा रोहित की गर्लफ्रेंड है। वह अगले हफ़्ते उसे प्रपोज़ करने का प्लान बना रहा है।

उस सुबह मेरे ऑफिस में होने के कई कारण थे। मैं एक डेंटल क्लिनिक में रिसेप्शनिस्ट हूँ, और जब कॉल आया तो मेरी शिफ़्ट शुरू हो चुकी थी। आखिरी मिनट में शेड्यूल बदल गया, कुछ अपॉइंटमेंट कैंसिल हो गए, और डॉक्टर ने कहा कि अगर मैं चाहूँ तो सुबह की छुट्टी ले सकती हूँ।

मुझे याद है मैंने सोचा था: बढ़िया। मैं करण को ताज़ी बनी चाय का एक कप देकर सरप्राइज़ दूँगी और शायद डिनर से पहले थोड़ा घर का काम भी कर लूँगी।

मुझे कोई अंदाज़ा नहीं था कि असली सरप्राइज़ कौन होगा।

जब मैंने सामने का दरवाज़ा खोला, तो मुझे लिविंग रूम से आवाज़ें आती सुनाई दीं। मैंने तुरंत अपने पति की आवाज़ पहचान ली। आवाज़ धीमी थी—लेकिन जानी-पहचानी थी।

यह ईशा की आवाज़ थी।

मैं हॉलवे में जमी खड़ी रही। उसने मुझे अंदर आते हुए नहीं सुना।

मैं चुपचाप कुछ कदम आगे बढ़ी, बस इतना कि दरवाज़े से उन्हें देख सकूँ।

मैं दरवाज़े की ओट में खड़ी थी।
मेरा दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था कि लगा, अभी आवाज़ बाहर निकल जाएगी।

करण सोफ़े पर बैठे थे।
सिर झुका हुआ।
हाथ आपस में जकड़े हुए।

ईशा उनके सामने कुर्सी पर थी।
उसकी आँखें लाल थीं, जैसे वह काफी देर से रो रही हो।

फिर उसने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—

“आंटी…
मुझे नहीं पता था कि ये बात इतने सालों से छुपी हुई है।
लेकिन अब मैं और नहीं छुपा सकती।”

मेरे पैरों में जैसे जान ही नहीं रही।
मैं आगे बढ़ी।

फर्श पर हल्की-सी आवाज़ हुई।

दोनों चौंक गए।

करण ने मेरी तरफ देखा।
उसकी आँखों में डर था।
अपराधबोध था।

ईशा खड़ी हो गई।

“आंटी…”
उसकी आवाज़ काँप रही थी।

मैंने खुद को संभालते हुए कहा—

“जो भी कहना है, अभी कहो।
अब कोई आधा सच नहीं।”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

कुछ सेकंड…
जो घंटों जैसे लगे।

फिर ईशा ने गहरी साँस ली और बोली—

“आंटी…
मैं आपकी बेटी अनन्या की सगी बहन हूँ।”

मेरे कानों में जैसे कुछ गूंजने लगा।

“क्या…?”
मेरे मुँह से बस यही निकला।

करण ने आँखें बंद कर लीं।

ईशा बोलती चली गई—

“मेरी माँ…
आपकी पुरानी सहेली…
सालों पहले हालात से मजबूर होकर एक बच्ची को गोद देने को मजबूर हुई थीं।”

“वही बच्ची…
अनन्या है।”

मेरे हाथ काँपने लगे।

“मुझे ये सच हाल ही में पता चला,”
ईशा ने कहा।
“एक पुराने खत से।”

उसकी आँखों से आँसू गिर रहे थे।

“मैं रोहित से शादी करना चाहती हूँ,”
वह बोली।
“लेकिन झूठ के साथ नहीं।
मैं सच छुपाकर उसकी ज़िंदगी शुरू नहीं कर सकती।”

कमरा जैसे सुन्न हो गया।

मैंने करण की तरफ देखा।

“तुम जानते थे?”
मेरी आवाज़ भारी थी।

उन्होंने सिर झुका लिया।

“हाँ,”
उन्होंने कहा।
“मैंने वादा किया था कि ये राज़ अनन्या की भलाई के लिए छुपा रहेगा।”

“लेकिन आज मुझे लगा—
सच छुपाना उससे भी बड़ा गुनाह है।”

मैं कुर्सी पर बैठ गई।

मेरे सामने अनन्या का चेहरा घूमने लगा—
उसकी हँसी…
उसका भरोसा…

तभी दरवाज़ा खुला।

रोहित और अनन्या अंदर आए।

“माँ, क्या हुआ?”
रोहित ने पूछा।

मैंने दोनों को पास बैठाया।

और सब कुछ बता दिया।

अनन्या चुप रही।

बहुत देर तक।

फिर वह उठी…
धीरे-धीरे ईशा के पास गई…

और उसे गले लगा लिया।

“बहन,”
उसने बस इतना कहा।

ईशा फूट-फूटकर रो पड़ी।

रोहित ने ईशा का हाथ थाम लिया।

“हम सच के साथ आगे बढ़ेंगे,”
उसने कहा।
“चाहे रास्ता मुश्किल क्यों न हो।”

उस सुबह ने मुझे एक बात सिखा दी—

परिवार सिर्फ खून से नहीं बनता।
परिवार बनता है सचहिम्मत और प्यार से।

और कभी-कभी…
एक डरावना सच ही
सबसे खूबसूरत नई शुरुआत बन जाता है।