बच्ची गुड़िया के जन्म के बाद से हमारा घर हमेशा रौनक से भरा रहता था। मेरा नाम अनिता (28) है। गुड़िया को जन्म दिए तीन महीने से ज़्यादा हो चुके थे, और माँ बनने के शुरुआती तनाव से मैं धीरे-धीरे उबर रही थी। मेरे पति राहुल (31) एक सिविल इंजीनियर हैं—सुबह जल्दी निकलते, देर से लौटते—लेकिन बेटी से बेहद प्यार करते हैं। गुड़िया के दादाजी, शर्मा जी (63), स्वभाव से बहुत सीधे-सादे हैं और पोती को सोने से भी ज़्यादा कीमती समझते हैं।
सब कुछ एक अजीब-सी बात से शुरू हुआ: जैसे ही शर्मा जी गुड़िया को गोद में लेते, वह ज़ोर-ज़ोर से रोने लगती।
शुरू में मैंने सोचा, बच्ची छोटी है, आसानी से घबरा जाती होगी। लेकिन अजीब यह था कि मैं उसे गोद में लेती तो गुड़िया तुरंत ऊँघने लगती; दादी गोद में लेतीं तो बस हल्की-सी आवाज़ करती। यहाँ तक कि आया गोद में ले लेती तो वह मुस्कुरा देती। मगर जैसे ही शर्मा जी हाथ बढ़ाते, गुड़िया जैसे “स्विच ऑन” हो जाती—चेहरा लाल, शरीर तना हुआ, और आवाज़ बैठ जाने तक रोती।
शर्मा जी साफ़-साफ़ उदास दिखने लगे। एक कोने में बैठ जाते, हाथ बढ़ाकर फिर वापस खींच लेते और फीकी-सी मुस्कान के साथ कहते:
“छोड़ो… शायद इसे मेरी गोद पसंद नहीं।”
मेरा दिल भर आता—बच्ची पर भी तरस, उन पर भी। लेकिन मन में डर भी घर करने लगा। कई बार शर्मा जी ने बस कुछ सेकंड के लिए ही गुड़िया को गोद में लिया, और वह ऐसे रोई जैसे किसी ने दर्द दे दिया हो।
एक रात मैं गुड़िया को सुला रही थी, तभी शर्मा जी कमरे में आए और बोले कि बस ज़रा-सा पोती को देखना चाहते हैं। उन्होंने उसे छुआ तक नहीं—सिर्फ़ पास खड़े हुए—और गुड़िया का चेहरा सिकुड़ गया, वह सिसकने लगी, आँखें चौड़ी कर लीं और घबराकर रोने लगी। मैं घबरा गई, दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।
राहुल झुंझला उठा:
“पापा, आप उसके पास मत आया कीजिए, देखिए कितना रो रही है!” शर्मा जी ठिठक गए, कुछ नहीं बोले और चुपचाप बाहर चले गए। मैं उन्हें जाते हुए देखती रही—गला भर आया।
अगली सुबह मैंने तय किया कि बच्ची को डॉक्टर को दिखाना ही होगा। मन में खुद को समझाया: बच्चे संवेदनशील हो सकते हैं, लेकिन सिर्फ़ एक ही इंसान पर इतनी तीखी प्रतिक्रिया—वो भी अपने ही दादाजी—यह सामान्य नहीं हो सकता।
अस्पताल में बाल-रोग विशेषज्ञ ने गुड़िया को थोड़ी देर देखा और बहुत ध्यान से पूछा:
“क्या जब दादाजी गोद में लेते हैं, तो बच्ची शरीर को पीछे की ओर मोड़ती है, गर्दन अकड़ जाती है, चेहरा लाल हो जाता है?”
मैंने सिर हिलाया—मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।
डॉक्टर कुछ सेकंड चुप रहे, फिर एक वाक्य कहा जिसने मुझे जैसे ज़मीन पर गड़ा दिया:
डॉक्टर ने गहरी साँस ली। उनकी आवाज़ शांत थी, लेकिन शब्द भारी थे।
उन्होंने कहा,
“यह डर या नफ़रत नहीं है… यह शारीरिक दर्द की प्रतिक्रिया है।”
मेरे कानों में जैसे आवाज़ गूंजने लगी।
मैंने घबराकर पूछा,
“दर्द? लेकिन उसे तो कोई मारता भी नहीं… सिर्फ़ गोद में लेते हैं।”
डॉक्टर ने गुड़िया को धीरे से उठाया, उसके शरीर की मुद्रा दिखाई और बोले,
“इस बच्चे को साइलेंट रिफ़्लक्स है। जब उसे गोद में गलत कोण पर पकड़ा जाता है, तो पेट का एसिड ऊपर आता है। बच्चा बोल नहीं सकता, इसलिए वह शरीर मोड़कर, गर्दन पीछे झुकाकर और ज़ोर से रोकर प्रतिक्रिया देता है।”
मेरा दिल बैठने लगा।
“लेकिन… सिर्फ़ दादाजी के साथ ही ऐसा क्यों?”
डॉक्टर कुछ पल रुके, फिर बोले,
“क्योंकि दादाजी उसे बहुत कसकर पकड़ते हैं। ऊपर से उनके कपड़ों की गंध, आफ़्टरशेव की तेज़ खुशबू—ये सब मिलकर बच्चे की तकलीफ़ बढ़ा देते हैं।”
राहुल ने मेरी ओर देखा। उसकी आँखों में राहत भी थी और गहरा अपराधबोध भी।
मैंने हकलाते हुए पूछा,
“तो… क्या ये ठीक हो सकता है?”
डॉक्टर मुस्कराए।
“बिलकुल। सही तरीक़े से गोद में लिया जाए, तो बच्चा ठीक रहेगा। यह बीमारी नहीं, बस समझ की कमी है।”
घर लौटते समय मैंने शर्मा जी को फोन किया।
उन्होंने फोन देर से उठाया। आवाज़ भारी थी।
मैंने सारी बात बताई—एक-एक शब्द।
फोन के उस पार कुछ देर चुप्पी रही।
फिर उन्होंने बहुत धीमे से कहा,
“मैं तो बस डरता था… कहीं मेरी पोती गिर न जाए।”
उस रात हम सब ड्रॉइंग रूम में बैठे।
मैंने डॉक्टर की हर बात दोहराई।
शर्मा जी ने बिना कुछ कहे अपनी आफ़्टरशेव अलमारी में रख दी।
भारी कुर्ता बदलकर मुलायम सूती शर्ट पहन ली।
फिर वे झिझकते हुए गुड़िया के पास आए।
मैंने तकिया रखा और धीरे से कहा,
“सिर थोड़ा ऊँचा… और ज़रा ढीला पकड़िए।”
गुड़िया ने पहले हल्की-सी आवाज़ की।
शर्मा जी घबरा गए, हाथ ढीला कर लिया।
कमरे में सन्नाटा था।
सभी की साँसें रुकी हुई थीं।
और फिर—
गुड़िया का रोना रुक गया।
उसकी आँखें धीरे-धीरे बंद हुईं और वह दादाजी के सीने पर टिककर सो गई।
शर्मा जी की आँखों से आँसू बह निकले।
उन्होंने फुसफुसाकर कहा,
“माफ़ करना, बिटिया… दादा को समझ नहीं थी।”
राहुल ने उनका कंधा थाम लिया।
और मुझे लगा जैसे घर का कोई भारी बोझ उतर गया हो।
अगले कुछ हफ्तों में हमने नियम बना लिए—
खुशबू नहीं।
कसकर पकड़ना नहीं।
हमेशा सिर ऊँचा।
हर दिन गुड़िया बेहतर होती गई।
एक शाम उसने दादाजी की उँगली पकड़ ली…
और मुस्कुरा दी।
वह छोटी-सी मुस्कान हमारे लिए किसी चमत्कार से कम नहीं थी।
फॉलो-अप में डॉक्टर ने कहा,
“समय के साथ यह अपने आप ठीक हो जाएगा।”
घर लौटते समय शर्मा जी बोले,
“आज मैंने सीखा—प्यार का मतलब कसकर पकड़ना नहीं होता,
बल्कि समझकर थामना होता है।”
उस रात गुड़िया पहली बार दादाजी के साथ हँसी।
और मेरे दिल में एक गहरी सीख बैठ गई—
कभी-कभी रिश्तों में दरार नफ़रत से नहीं,
गलतफ़हमी से पड़ती है।
और एक सही सवाल, एक ईमानदार बातचीत,
पूरे परिवार को बचा सकती है।
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