2000 में स्कूल की एक फील्ड ट्रिप के दौरान लड़का गायब हो गया… और सच छब्बीस साल बाद पता चला…
27 मार्च, 2000 को, नई दिल्ली के सरस्वती विद्या निकेतन स्कूल के आठवीं क्लास के स्टूडेंट्स ने अरावली पहाड़ों की फील्ड ट्रिप प्लान की। यह एक साइंस और नेचर स्टडी ट्रिप थी, जिसमें फील्ड ट्रिप और लाइफ स्किल्स ट्रेनिंग भी शामिल थी।
पहुँचने पर, माहौल नॉर्मल था, ऐसा कोई इशारा नहीं था कि यह दिन स्कूल या स्टूडेंट्स की ज़िंदगी पर कोई बुरा असर डालेगा।
स्टूडेंट्स में आरव शर्मा भी था, जो एक शांत, ज़िम्मेदार और पढ़ाई में होशियार 15 साल का लड़का था। उसे हमेशा अपने सभी लेसन का रिकॉर्ड एक रेड-डॉट डायरी में रखने की आदत थी और उसे घर लाना कभी नहीं भूलता था।
ट्रिप बिना किसी घटना के शुरू हुई। टीचर्स ने स्टूडेंट्स को दो ग्रुप्स में बाँट दिया ताकि वे अलग-अलग रास्तों से पहाड़ियों को एक्सप्लोर कर सकें, और फिर मेन लोकेशन पर मिल सकें। आरव उस ग्रुप में था जिसे एक युवा टीचर, मिस रीना लीड कर रही थीं, जो स्कूल में सिर्फ़ एक साल से थोड़ा ज़्यादा समय से काम कर रही थीं।
रास्ते में, एक छोटी सी झील और कुछ फिसलन भरी चट्टानों के पास, मिस रीना ने स्टूडेंट्स को रुकने और इकट्ठा होने के लिए कहा। तभी उन्हें एहसास हुआ कि एक स्टूडेंट गायब है।
“क्या किसी ने आरव को देखा है?” उसने शांत रहने की कोशिश करते हुए पूछा।
कोई जवाब नहीं आया। कुछ लोगों को लगा कि वह शायद आस-पास कहीं भटक गया होगा, दूसरों को लगा कि वह अपनी डायरी में किसी पौधे या जंगली फूल के बारे में लिख रहा है। यह सब पंद्रह मिनट से भी कम समय में हुआ, लेकिन रीना का दिल ज़ोरों से धड़क रहा था।
इसके तुरंत बाद, मिस रीना ने स्कूल एडमिनिस्ट्रेशन को फ़ोन किया और मदद की उम्मीद में रेस्क्यू टीम और पुलिस से कॉन्टैक्ट किया।
लगभग एक घंटे बाद, खोज शुरू हुई। पहाड़ियों से आवाज़ें गूंज रही थीं। टीचर, रेस्क्यू टीम, पुलिस, स्निफर डॉग और वॉलंटियर अलग-अलग दिशाओं में फैल गए, जबकि क्लासमेट घबरा गए, परेशान हो गए और रो पड़े। घंटों तक खोजबीन चली लेकिन कोई सुराग नहीं मिला—न बैग, न लाल-बिंदु वाली डायरी, न झील के किनारे कोई ताज़ा पैरों के निशान। ऐसा लगा जैसे धरती ने आरव को निगल लिया हो।
अगले कुछ दिनों में, हेलीकॉप्टर अरावली रेंज के ऊपर मंडराते रहे, और खोजी टीमें पहाड़ों पर चढ़ती रहीं, हर रास्ते और दरार की जांच करती रहीं। आरव शर्मा के माता-पिता टीवी पर अपने बेटे के बारे में कोई भी जानकारी देने की गुहार लगाते हुए दिखे। मीडिया का दबाव बढ़ा, और पुलिस ने हर संभावना की जांच शुरू कर दी: दुर्घटना, घर से भागना, किडनैपिंग। लेकिन कोई भी थ्योरी सही नहीं लग रही थी। आरव के भागने का कोई कारण नहीं था, मानसिक परेशानी का कोई संकेत नहीं था। इलाका खतरनाक था, फिर भी इतना पास नहीं था कि तुरंत कोई दुर्घटना हो जाए। और किडनैपिंग का कोई सबूत नहीं था।
एक हफ्ते बाद, आरव शर्मा का नाम नई दिल्ली में चर्चा का विषय बन गया। अफवाहें फैलीं—कुछ बेतुकी, कुछ सनसनीखेज। लेकिन समय के साथ, मामला गुमनामी में खो गया। नई खबरों, दूसरी सामाजिक उथल-पुथल ने इस गायब होने को अंधेरे में धकेल दिया। केस को “अनसॉल्व्ड” कैटेगरी में रखा गया था।
लेकिन छब्बीस साल बाद, 2026 में, एक अचानक आए फ़ोन कॉल ने सब कुछ फिर से ज़िंदा कर दिया।
सच आखिरकार सामने आने वाला है…
2026 की उस सुबह, जब फोन की घंटी बजी, तो किसी ने नहीं सोचा था कि छब्बीस साल पहले दबा दिया गया एक नाम फिर से हवा में गूंज उठेगा। नई दिल्ली पुलिस कंट्रोल रूम में ड्यूटी पर तैनात इंस्पेक्टर कबीर मल्होत्रा ने रिसीवर उठाया। उधर से आवाज़ कांप रही थी—“मैं… मैं आरव शर्मा को जानता हूँ। और… और मुझे लगता है कि अब सच बताने का वक्त आ गया है।”
“आप कौन बोल रहे हैं?” कबीर ने तुरंत पूछा।
“नाम मायने नहीं रखता,” आवाज़ बोली, “मायने रखता है कि आरव जिंदा है… और उसने वो लाल-बिंदु वाली डायरी कभी नहीं छोड़ी।”
कबीर की कुर्सी चरमराई। उसने रिकॉर्डिंग चालू कर दी। “आप जानते हैं कि आप क्या कह रहे हैं?”
“हां,” आवाज़ ने गहरी सांस ली, “और मैं जानता हूँ कि सच बताने से कई ज़िंदगियां उलट-पलट हो जाएंगी।”
तीन घंटे बाद, एक बूढ़ा आदमी—सफेद दाढ़ी, झुकी हुई पीठ—पुलिस स्टेशन के बाहर खड़ा था। नाम: शिवनाथ रावत। पेशा: अरावली रेंज में कभी वन-गाइड। उसने अंदर आते ही कहा, “मुझे जेल से डर नहीं है। मुझे डर है कि सच मेरे साथ ही मर न जाए।”
कबीर ने उसे पानी दिया। “आप जो भी जानते हैं, विस्तार से बताइए।”
शिवनाथ की आंखें भर आईं। “उस दिन… 27 मार्च 2000… मैं भी वहीं था। झील के पास।”
फ्लैशबैक जैसे कमरे में उतर आया। शिवनाथ ने बताया कि उस दोपहर उसने एक लड़के को अकेले देखा—हाथ में वही लाल-डॉट डायरी। “वो लिख रहा था,” उसने कहा, “बहुत ध्यान से। तभी मैंने दो वयस्कों को देखा। वे टीचर जैसे लग रहे थे, पर उनकी बातें… अजीब थीं।”
“कौन?” कबीर ने टोका।
“एक महिला—मिस रीना—और दूसरा… स्कूल का ड्राइवर नहीं था, कोई बाहरी आदमी था। उन्होंने लड़के को पास बुलाया।”
कबीर ने फाइल खंगाली। मिस रीना का नाम—रीना चौधरी—आज भी जीवित थी, लेकिन बीस साल पहले उसने अचानक नौकरी छोड़ दी थी और शहर बदल लिया था।
“फिर क्या हुआ?”
शिवनाथ की आवाज़ टूट गई। “लड़के ने कहा—‘मैडम, मुझे बाकी ग्रुप से अलग क्यों बुला रही हैं?’ और वो आदमी बोला—‘तुम्हारी डायरी में क्या है, हमें दिखाओ।’ लड़का पीछे हटा। तभी… धक्का-मुक्की हुई। झील के पास की चट्टान फिसलन भरी थी।”
“क्या वो गिर गया?”
“नहीं,” शिवनाथ ने सिर हिलाया, “गिरा नहीं। उसे जबरदस्ती जंगल की तरफ ले जाया गया।”
कबीर के माथे पर पसीना आ गया। “आपने पुलिस को तब क्यों नहीं बताया?”
“बताता तो मेरी लाश मिलती,” शिवनाथ ने कहा। “उस आदमी ने मुझे देखा। रात में मेरे झोंपड़े के बाहर आकर बोला—‘अगर जीना है, तो भूल जाओ।’”
जांच दोबारा खुली। मीडिया पागल हो गया। कबीर की टीम ने रीना चौधरी को ट्रेस किया—वह अब देहरादून के पास एक आश्रम में रह रही थी। जब उसे हिरासत में लिया गया, तो उसने पहले इंकार किया।
“मैंने कुछ नहीं किया,” उसने सपाट कहा।
“आरव की डायरी का रंग क्या था?” कबीर ने अचानक पूछा।
रीना के होंठ कांप गए। “लाल… उस पर… एक बिंदु।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
पूछताछ लंबी चली। आखिरकार, टूटते हुए उसने स्वीकार किया—“मुझसे गलती हुई। बहुत बड़ी।”
उसने बताया कि उस समय स्कूल में एक बड़ा घोटाला चल रहा था—फंड्स की हेराफेरी। आरव की डायरी में सिर्फ पौधों के नोट्स नहीं थे; उसने गलती से कुछ रसीदों और बातचीत के टुकड़े लिख लिए थे, जो उसने बस में सुने थे। “वो बच्चा सब कुछ लिखता था,” रीना सिसकते हुए बोली।
“और आपने उसे अगवा किया?”
“मैंने नहीं चाहा था,” उसने कहा, “लेकिन वो आदमी—विक्रम—ने कहा कि अगर डायरी बाहर आई तो सब खत्म।”
“विक्रम कौन है?”
“स्कूल ट्रस्ट का रिश्तेदार,” रीना ने फुसफुसाया। “बहुत ताकतवर।”
सबसे बड़ा झटका तब लगा जब पुलिस को पता चला कि आरव मरा नहीं था। उसे जंगल के एक पुराने आश्रम में छुपाया गया, जहां एक साधु—महेंद्र—ने उसकी देखभाल की। विक्रम का प्लान था कि कुछ समय बाद बच्चे को किसी दूर शहर में छोड़ दिया जाए, ताकि सबूत मिट जाएं। लेकिन साधु ने हस्तक्षेप किया।
“उस बच्चे की आंखों में डर था,” महेंद्र ने बाद में कहा। “मैंने उसे जाने नहीं दिया।”
आरव का नाम बदल दिया गया। वह वर्षों तक साधु के साथ रहा, पढ़ा-लिखा, बड़ा हुआ। उसे बताया गया कि बाहर की दुनिया उसके लिए खतरनाक है। पर डायरी… वह उसने संभाल कर रखी।
“मैं भूल नहीं सकता था,” आरव ने कबीर से पहली मुलाकात में कहा। उसकी आवाज़ शांत थी, पर आंखों में तूफान। “मैं हर रात लिखता था—सच।”
जब डीएनए टेस्ट हुआ और पुष्टि हुई कि वही आरव शर्मा है, तो उसके माता-पिता—अब बूढ़े—रोते हुए पुलिस स्टेशन पहुंचे। मां ने उसके चेहरे को छुआ, जैसे डर हो कि वह सपना न हो।
“मेरा बच्चा…”
आरव ने धीरे से कहा, “मां… मैं घर आ गया हूँ।”
कोर्ट में केस चला। विक्रम गिरफ्तार हुआ। फंड घोटाला उजागर हुआ। स्कूल ट्रस्ट भंग हुआ। रीना को सजा मिली, लेकिन कोर्ट ने यह भी माना कि उसने सच बताकर एक बच्चे की ज़िंदगी लौटाई।
सबसे भावुक पल तब आया जब आरव ने अदालत में अपनी डायरी पेश की।
“यह सिर्फ मेरी कहानी नहीं,” उसने कहा, “यह सबूत है कि सच देर से सही, आता ज़रूर है।”
अंत में, आरव ने पढ़ाई पूरी की और पर्यावरण विज्ञान में काम करने लगा—उसी प्रकृति के लिए, जहां वह खोया था। उसने वही लाल-बिंदु वाली डायरी एक संग्रहालय को दान कर दी, ताकि लोग याद रखें।
मां ने उससे पूछा, “तुमने हमें माफ़ कर दिया?”
उसने मुस्कराकर कहा, “माफ़ी नहीं, मां। समझ।”
छब्बीस साल बाद, एक बच्चा लौट आया। और दुनिया ने सीखा—सच को दबाया जा सकता है, मिटाया नहीं। डर से चुप्पी अपराध को लंबा करती है, और एक छोटी-सी डायरी भी बड़े-बड़े झूठों को गिरा सकती है।
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