ढाबे वाले ने फौजियों से नहीं लिए खाने के पैसे, कुछ महीने बाद जब सेना का ट्रक दुबारा आया तो फिर जो
“एक रोटी का कर्ज: सरहद, देशभक्ति और किस्मत की सौगात”
भूमिका
क्या देशभक्ति सिर्फ सरहदों पर बंदूक उठाने का नाम है? या वह उस गरीब के दिल में भी जलती है, जो अपनी एक वक्त की रोटी उस वर्दी वाले को खिलाकर खुद को धन्य समझता है, जो देश के लिए अपनी जान हथेली पर लिए घूमता है। क्या नेकी का कोई मोल होता है? और अगर होता है तो क्या किस्मत उसका कर्ज चुकाने के लिए खुद चलकर आती है?
यह कहानी है बलवंत सिंह की। एक ऐसे बूढ़े ढाबे वाले की, जिसके लिए फौजी की वर्दी भगवान का रूप थी। जिसने अपनी सारी जमा पूंजी और अपनी बेटी के भविष्य की चिंता को एक तरफ रखकर सरहद जा रहे भूखे प्यासे फौजियों को अपने हाथों से खाना खिलाया और बदले में एक पैसा तक नहीं लिया। उसने तो बस अपना फर्ज निभाया था। पर कुछ महीने बाद जब इसी सेना का एक काफिला दोबारा उसके टूटे-फूटे ढाबे पर रुका, तो वे अपने साथ सिर्फ यादें नहीं बल्कि एक ऐसी सौगात लेकर आए थे, जिसने ना सिर्फ बलवंत सिंह की बल्कि उसकी आने वाली सात पुश्तों की तकदीर को हमेशा के लिए बदल दिया।
भाग 1: पठानकोट-जम्मू हाईवे पर एक ढाबा
पठानकोट से जम्मू की ओर जाने वाले नेशनल हाईवे पर पहाड़ों की तलहटी में एक छोटा सा लगभग गुमनाम सा ढाबा था—नाम था “शेर ए पंजाब फौजी ढाबा”। यह कोई आलीशान रेस्टोरेंट नहीं था। बांस के खंभों पर टिकी एक टीन की छत, कुछ पुरानी लकड़ी की बेंचें और मेजें, एक कोने में धुएं से काली हो चुकी रसोई। पर इस ढाबे की हवा में एक अजीब सा अपनापन और खाने में घर जैसी मोहब्बत थी। यहां के खाने की खुशबू दूर-दूर तक मुसाफिरों को अपनी ओर खींच लाती थी।
इस ढाबे के मालिक और एकमात्र रसोइए थे 70 साल के सरदार बलवंत सिंह। सफेद लंबी दाढ़ी, सिर पर नीली पगड़ी और चेहरे पर जिंदगी के तजुर्बों की गहरी लकीरें। पर उन लकीरों के बीच उनकी आंखों में एक ऐसी चमक थी जो किसी फौजी में ही देखने को मिलती है।
भाग 2: बलवंत सिंह की जिंदगी और सपना
बलवंत सिंह की जिंदगी संघर्ष और स्वाभिमान की एक लंबी दास्तान थी। जवानी में वह खुद फौज में भर्ती होना चाहते थे, पर परिवार की जिम्मेदारियों ने उन्हें रोक लिया। उनका यह सपना उनके इकलौते बेटे विक्रम ने पूरा किया था। विक्रम भारतीय सेना में कैप्टन था, पर चार साल पहले कश्मीर में आतंकियों से हुई एक मुठभेड़ में कैप्टन विक्रम सिंह देश के लिए शहीद हो गया था। उस हादसे में विक्रम की पत्नी भी चल बसी थी, और अपने पीछे छोड़ गई थी पांच साल की बेटी—प्रिया।
अब इस दुनिया में बलवंत सिंह का प्रिया के सिवा कोई नहीं था। प्रिया ही उनकी जिंदगी, उनका हौसला और जीने का एकमात्र मकसद थी। अब वह 12 साल की हो चुकी थी और पास के सरकारी स्कूल में सातवीं कक्षा में पढ़ती थी। वह पढ़ने में बहुत होशियार थी और डॉक्टर बनना चाहती थी। बलवंत सिंह अपनी इस पोती के सपने को पूरा करने के लिए दिन-रात मेहनत करते। ढाबे से जो कुछ कमाई होती, उससे घर का खर्च और प्रिया की पढ़ाई किसी तरह चलती थी। छत टपकती थी और कमाई बस इतनी थी कि दो वक्त की रोटी और थोड़ी बहुत बचत हो पाती। प्रिया की आगे की पढ़ाई और डॉक्टरी का खर्चा किसी पहाड़ जैसा था, जिसे देखकर बलवंत सिंह की हिम्मत अक्सर जवाब दे जाती। पर वह अपनी पोती के सामने कभी अपनी चिंता जाहिर नहीं करते थे।
भाग 3: एक फौजी काफिले का आगमन
अगस्त का महीना था। उमस भरी गर्मी और चिपचिपा पसीना। दोपहर का वक्त था और ढाबे पर ज्यादा भीड़ नहीं थी। बलवंत सिंह अपनी रसोई में रोटियां सेक रहे थे और प्रिया बाहर बैठी अपने स्कूल का होमवर्क कर रही थी। तभी धूल उड़ाते हुए सेना के तीन बड़े ट्रक ढाबे के सामने आकर रुके। उनमें से करीब 20–25 फौजी उतरे। उनकी वर्दियां धूल से सनी हुई थीं, चेहरे थकान से मुरझाए हुए थे, पर आंखों में एक गजब की दृढ़ता और अनुशासन था।
बलवंत सिंह ने जैसे ही फौजियों को देखा, उनके हाथ एक पल के लिए रुक गए। उनके दिल में एक साथ कई भावनाएं उमड़ पड़ी—अपने बेटे की याद, फौजी वर्दी के लिए सम्मान और इन जवानों के लिए एक पिता जैसी ममता। वह फौरन अपनी रसोई से बाहर आए—”आओ पुत्तर, आओ जी आया।” उनकी आवाज में एक गहरी गर्मजोशी थी। फौजी बेंचों पर बैठ गए। उनके लीडर, रबदार मूछों वाले सूबेदार मेजर गुरमीत सिंह ने बलवंत सिंह से पूछा—”बाऊजी, खाना मिलेगा? जवान बहुत भूखे हैं। लंबा सफर तय करके आए हैं और आगे भी लंबा सफर है। सरहद पर जा रहे हैं।”
सरहद यह शब्द सुनते ही बलवंत सिंह का सीना गर्व से चौड़ा हो गया—”हाहा पुत्तर, क्यों नहीं! आज तो मेरे ढाबे की किस्मत खुल गई कि देश के रक्षक खुद मेरे यहां मेहमान बनकर आए हैं। तुम लोग हाथ मुंह धो लो, मैं अभी गरमा गरम खाना लगाता हूं।”
भाग 4: एक रोटी का त्याग
अगले एक घंटे तक बलवंत सिंह ने अपनी उम्र और अपनी थकान को भुलाकर एक जुनून के साथ काम किया। उन्होंने खुद ताजी रोटियां सेकी, दाल में घर के बने मक्खन का तड़का लगाया, आलू गोभी की सब्जी बनाई और साथ में प्याज-हरी मिर्च का सलाद काटा। प्रिया भी दौड़-दौड़ कर सबको पानी पिला रही थी। उसकी नन्ही आंखों में भी उन फौजियों के लिए एक गहरा सम्मान था।
फौजियों ने कई दिनों बाद ऐसा स्वादिष्ट और घर जैसा खाना खाया था। वे सब बहुत खुश थे। खाना खाने के बाद सूबेदार गुरमीत सिंह बिल चुकाने के लिए बलवंत सिंह के पास आए—”बाऊजी, कितना पैसा हुआ?”
बलवंत सिंह जो अब तक चूल्हे के पास बैठे उन जवानों को तृप्ति से खाना खाते देख रहे थे, उनकी आंखें नम हो गई। उन्होंने हाथ जोड़ लिए—”नहीं पुत्तर, पैसे नहीं।”
“क्यों बाऊजी, कोई कमी रह गई क्या खाने में?” गुरमीत सिंह ने हैरानी से पूछा।
“नहीं पुत्र, कमी मेरे खाने में नहीं, मेरी किस्मत में रह गई थी जो आज तुम लोगों ने आकर पूरी कर दी।”
“तुम लोग देश की रखवाली के लिए अपनी जान देने जा रहे हो। बर्फीली चोटियों पर तपते रेगिस्तानों में तुम जागते हो, तब हम यहां चैन से सोते हैं। और मैं एक बूढ़ा बाप तुम लोगों को एक वक्त की रोटी खिलाकर उसके पैसे लूं? नहीं पुत्र, मुझसे यह पाप नहीं होगा।”
सूबेदार गुरमीत सिंह और बाकी जवान उनकी यह बात सुनकर निशब्द हो गए। “बाऊजी, हम आपकी भावनाओं की कद्र करते हैं, पर यह नियम के खिलाफ है, हम मुफ्त में खाना नहीं खा सकते।”
“पुत्र, आज तो मुझे नियम कानून मत सिखाओ। मेरा भी एक बेटा था—कैप्टन विक्रम सिंह।” बलवंत सिंह ने दीवार पर लगी अपने बेटे की तस्वीर की ओर इशारा किया। “वह भी तुम्हारी तरह इसी वर्दी में देश की सेवा करते हुए शहीद हो गया। जब वह छुट्टियों में आता था, तो इसी ढाबे पर बैठकर मेरे हाथ की बनी दाल-रोटी खाता था। आज जब मैंने तुम सबको खाते हुए देखा, तो मुझे लगा जैसे मेरा विक्रम ही वापस आ गया है। आज तुम सब मेरे विक्रम हो और कोई बाप अपने बच्चों से खाने के पैसे नहीं लेता।”
यह सुनकर वहां मौजूद हर फौजी की आंखें नम हो गईं। सूबेदार गुरमीत सिंह ने आगे बढ़कर बलवंत सिंह को गले लगा लिया—”बाऊजी, आप सिर्फ एक ढाबे वाले नहीं, एक सच्चे देशभक्त और महान पिता हैं। देश को आप जैसे लोगों की बहुत जरूरत है।” उन्होंने बहुत जोर दिया, पर बलवंत सिंह ने एक भी पैसा लेने से साफ इंकार कर दिया।
चलते समय गुरमीत सिंह ने अपनी जेब से एक छोटा सा आर्मी का प्रतीक चिन्ह निकाला और बलवंत सिंह के हाथ में रख दिया—”इसे अपने पास रखिएगा बाऊजी। यह हमारी तरफ से आपके लिए एक छोटी सी सलामी है। और वादा रहा, जब भी हम इस रास्ते से गुजरेंगे, आपके हाथ की बनी रोटी खाने जरूर आएंगे।”
फौजी ट्रकों में बैठकर चले गए, पर बलवंत सिंह की आंखों में एक अजीब सी तृप्ति और शांति छोड़ गए। उस दिन उन्हें लगा कि उन्होंने अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी कमाई की है।
भाग 5: कठिनाइयां, कर्ज और बेबसी
फौजियों के जाने के बाद जिंदगी फिर से अपनी पुरानी रफ्तार पर लौट आई। पर अब मुश्किलें बढ़ने वाली थीं। कुछ ही हफ्तों में मानसून आ गया। इस साल बारिश ने जैसे सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। बलवंत सिंह का पुराना ढाबा इस मार को झेल नहीं पाया। टीन की छत में जगह-जगह छेद हो गए। पानी अंदर टपकने लगा। रसोई में रखा राशन, आटा, दालें—सब कुछ सीलन से खराब होने लगा। बैठने की बेंचें भी भीग कर फूलने लगी। ढाबे पर ग्राहक आने कम हो गए। जो आते भी वे टपकती हुई छत को देखकर वापस लौट जाते। बलवंत सिंह की कमाई लगभग ठप हो गई। घर में फाके पड़ने की नौबत आ गई।
प्रिया की स्कूल की फीस का समय भी नजदीक आ रहा था। बलवंत सिंह के पास कोई और रास्ता नहीं बचा। उन्होंने गांव के एक सूदखोर महाजन श्यामलाल से अपने ढाबे के कागज गिरवी रखकर ₹50,000 का कर्ज ले लिया। श्यामलाल एक बेहद लालची और पत्थर दिल इंसान था। उसकी नजर बहुत पहले से बलवंत सिंह के उस ढाबे पर थी, जो हाईवे की मुख्य जमीन पर था।
कर्ज के पैसों से प्रिया की फीस तो भर गई, पर घर का खर्च और ढाबे की मरम्मत का काम अभी भी बाकी था। बलवंत सिंह ने खुद ही बांस और तिरपाल लगाकर छत को ठीक करने की कोशिश की, पर वह नाकाफी था। दो महीने बीत गए। श्यामलाल अब अपने पैसे वापस मांगने लगा। वह रोज ढाबे पर आता और बलवंत सिंह को जलील करता—”ए बुड्ढे, मेरे पैसे कब लौटाएगा? वरना यह ढाबा खाली कर दे, अब यह मेरा है।”
“बाऊजी, मुझे कुछ और मोहलत दे दीजिए, फसल कटेगी तो…”
“अरे तेरी फसल का मैं क्या अचार डालूंगा? मुझे मेरे पैसे चाहिए, ब्याज के साथ!” श्यामलाल गुर्राया।
एक दिन तो उसने हद ही कर दी। वह अपने दो लठैतों के साथ आया और ढाबे का सामान बाहर फेंकने लगा। प्रिया यह देखकर डर के मारे अपने दादा से लिपट गई। बलवंत सिंह ने श्यामलाल के आगे हाथ जोड़े, गिड़गिड़ाए, पर उस पत्थर दिल पर कोई असर नहीं हुआ।
“देख बुड्ढे, मैं तुझे 10 दिन की मोहलत और देता हूं। अगर 10 दिन में मेरे पूरे ₹50,000 ब्याज मिलाकर नहीं मिले, तो 11वें दिन तू और तेरी यह पोती दोनों सड़क पर हो गए।” यह कहकर वह चला गया।
बलवंत सिंह पूरी तरह टूट चुके थे। ₹50,000 वह इतनी बड़ी रकम कहां से लाते? उन्हें लगा जैसे अब सब कुछ खत्म हो गया। उनकी आंखों के सामने अंधेरा छा गया। वह अपनी पोती के डॉक्टर बनने के सपने को, अपने शहीद बेटे की आखिरी निशानी इस ढाबे को, कुछ भी नहीं बचा पा रहे थे। उस रात कई सालों बाद एक फौजी का बाप, एक शहीद का पिता अपनी बेबसी पर फूट-फूट कर रोया।
भाग 6: किस्मत का दूसरा काफिला
एक दिन जब श्यामलाल ढाबे का सामान बाहर फेंक रहा था, तभी सड़क पर एक साथ कई गाड़ियों के हॉर्न बजे। बलवंत सिंह ने देखा—सेना के कई बड़े-बड़े ट्रक और जीपों का एक लंबा काफिला उनके ढाबे की ओर आ रहा था। उन्हें लगा कि शायद कोई और फौजी जा रहे होंगे, पर काफिला सीधा उनके ढाबे के सामने आकर रुका।
सबसे पहली जीप से सूबेदार मेजर गुरमीत सिंह उतरे। पर आज वह अकेले नहीं थे, उनके साथ एक और अफसर थे जिनके कंधे पर कर्नल के सितारे चमक रहे थे। उनका चेहरा बेहद अनुशासित और रौबदार था। गुरमीत सिंह ने आगे बढ़कर बलवंत सिंह के पैर छुए—”बाऊजी, हम आ गए अपना वादा निभाने।”
बलवंत सिंह उन्हें देखकर हैरान थे, पर उनकी आंखों में खुशी की जगह एक गहरी उदासी और बेबसी थी। तभी वहां श्यामलाल अपने लठैतों के साथ आ पहुंचा—”चलो बुड्ढे, मोहलत खत्म, खाली करो मेरा ढाबा।”
“यह तुम्हारा ढाबा कब से हो गया?” गुरमीत सिंह ने कड़क आवाज में पूछा।
“तू कौन है बे बीच में बोलने वाला? इस बुड्ढे ने मुझसे कर्ज लिया है, अब यह ढाबा मेरा है।” श्यामलाल ने घूर कर देखा।
कर्नल साहब, जो अब तक चुपचाप सब कुछ देख रहे थे, आगे बढ़े। उनकी आंखों में एक ऐसी ठंडक थी जिसे देखकर श्यामलाल जैसा आदमी भी कांप गया।
“कितना कर्ज लिया है इन्होंने?” कर्नल ने पूछा।
“जी जी, 50,000…” श्यामलाल हकलाया।
कर्नल ने अपने एक जवान को इशारा किया। जवान एक ब्रीफकेस लेकर आया। कर्नल ने उसे खोला—उसमें नोटों की गड्डियां भरी हुई थीं। उन्होंने ₹50,000 निकालकर श्यामलाल के मुंह पर दे मारे—”यह लो इनका कर्ज। और अब इससे पहले कि हम तुम्हारे इस कर्ज की कानूनी जांच करें, यहां से दफा हो जाओ।”
कर्नल की आवाज और उनके पद का रोब देखकर श्यामलाल की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। उसने चुपचाप पैसे उठाए और अपने लठैतों के साथ वहां से भाग निकला।
भाग 7: सेना का सम्मान और नई जिंदगी
बलवंत सिंह और प्रिया हैरान चुपचाप यह सब देख रहे थे। कर्नल साहब अब बलवंत सिंह की ओर मुड़े, उनके चेहरे पर अब एक नरम मुस्कान थी—”बाऊजी, हमें माफ कर दीजिएगा, हमें आने में थोड़ी देर हो गई।”
“नहीं साहब, आपने तो आज मेरी इज्जत बचा ली। मैं आपका यह एहसान…”
“एहसान नहीं बाऊजी, यह तो कर्ज है जो हम पर आपके उस एक दिन के खाने का चढ़ा हुआ है।” कर्नल ने कहा—”और हम फौजी किसी का कर्ज अपने ऊपर नहीं रखते।”
उन्होंने गुरमीत सिंह को इशारा किया। गुरमीत सिंह ने एक बड़ा सा फोल्डर कर्नल साहब को थमाया—”बाऊजी, आपने उस दिन हमारे 20 जवानों को खाना खिलाया था। आज हम 20 नहीं, 200 जवान आए हैं। और हम सब आज यही खाना खाएंगे। पर इस टूटे-फूटे ढाबे में नहीं, हम इसे दोबारा बनाएंगे।”
कर्नल ने फोल्डर खोला, जिसमें एक बिल्डिंग का नक्शा था—”बाऊजी, भारतीय सेना ने यह फैसला किया है कि वह आपके इस ढाबे को गोद लेगी। हम यहां एक नया बड़ा और आधुनिक ढाबा बनाएंगे। यह ढाबा सिर्फ ढाबा नहीं, बल्कि इस हाईवे पर भारतीय सेना का एक आधिकारिक विश्राम स्थल होगा। यहां से गुजरने वाला हर फौजी काफिला यहीं रुकेगा, यही खाना खाएगा। इसका पूरा ठेका आपका होगा। आपको हर महीने एक निश्चित आमदनी मिलेगी।”
बलवंत सिंह को अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था।
“और बाऊजी, इस ढाबे का नाम अब ‘शेर ए पंजाब फौजी ढाबा’ नहीं होगा। इसका नाम होगा ‘शहीद कैप्टन विक्रम सिंह मेमोरियल ढाबा’। यह आपके वीर बेटे को हमारी सेना की तरफ से एक छोटी सी श्रद्धांजलि होगी।”
यह सुनते ही बलवंत सिंह की आंखों से आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा। वह वहीं जमीन पर बैठ गए। उनके शहीद बेटे को, जिसे वह लगभग भूल चुके थे, आज इतना बड़ा सम्मान मिल रहा था।
भाग 8: प्रिया का सपना और सेना की सौगात
पर सौगातें अभी खत्म नहीं हुई थीं। कर्नल साहब प्रिया के पास गए और उसके सिर पर हाथ रखा—”बेटी, तुम डॉक्टर बनना चाहती हो ना?”
प्रिया ने डरते-डरते हां में सिर हिलाया।
“तो तुम्हारी पढ़ाई की पूरी जिम्मेदारी आज से भारतीय सेना की है। तुम्हारा एडमिशन पुणे के प्रतिष्ठित आर्म्ड फोर्सेस मेडिकल कॉलेज में करवाया जाएगा। तुम्हारा रहना, खाना, फीस—सब कुछ सेना उठाएगी। तुम बस मन लगाकर पढ़ना और एक बहुत अच्छी डॉक्टर बनकर देश की सेवा करना।”
यह एक ऐसा सपना था जो सच हो गया था। प्रिया और बलवंत सिंह दोनों रो रहे थे, पर यह आंसू दुख या बेबसी के नहीं, बल्कि अकल्पनीय खुशी और कृतज्ञता के थे।
भाग 9: नई शुरुआत, नया सम्मान
अगले कुछ ही महीनों में उस पुराने टूटे-फूटे ढाबे की जगह एक शानदार, बड़ा और साफ-सुथरा ‘शहीद कैप्टन विक्रम सिंह मेमोरियल ढाबा’ खड़ा हो गया। उसके उद्घाटन के लिए सेना के बड़े-बड़े अफसर आए। बलवंत सिंह ने अपने हाथों से फीता काटा। ढाबे के अंदर मुख्य दीवार पर कैप्टन विक्रम सिंह की एक बड़ी सी तस्वीर लगी थी, जिस पर फूलों का हार था।
बलवंत सिंह अब भी उसी ढाबे पर काम करते थे, पर अब वह एक मजबूर बूढ़े ढाबे वाले नहीं, बल्कि एक सम्मानित उद्यमी थे। वह आज भी हर फौजी को उसी प्यार और अपनेपन से खाना खिलाते थे। उनकी आंखों में अब चिंता की लकीरें नहीं, बल्कि गर्व और संतोष की चमक थी।
प्रिया भी अपनी डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए पुणे चली गई। वह जब भी छुट्टियों में आती, अपने दादा का हाथ बंटाने ढाबे पर पहुंच जाती।
भाग 10: देशभक्ति और नेकी का मोल
यह कहानी हमें सिखाती है कि देशभक्ति और नेकी का कोई भी काम, चाहे वह कितना भी छोटा क्यों न लगे, कभी व्यर्थ नहीं जाता। बलवंत सिंह ने तो बस कुछ भूखे फौजियों को एक वक्त की रोटी खिलाई थी, पर बदले में भारतीय सेना ने उन्हें और उनकी पोती को एक पूरी जिंदगी का सम्मान और सुरक्षा दे दी। यह साबित करता है कि भारतीय सेना सिर्फ सरहदों की ही नहीं, बल्कि अपने देश के सच्चे देशभक्तों के सम्मान की भी रक्षा करना जानती है।
अंतिम संदेश
अगर बलवंत सिंह की इस देशभक्ति और भारतीय सेना के इस विशाल हृदय ने आपके दिल में भी गर्व की एक लहर पैदा की है, तो कमेंट्स में “जय हिंद” लिखकर हमारे देश के वीर जवानों और बलवंत सिंह जैसे सच्चे नागरिकों को अपनी सलामी दें। इस कहानी को हर भारतीय के साथ शेयर करें ताकि देशभक्ति का यह जज्बा हर दिल तक पहुंच सके। ऐसी ही और प्रेरणादायक कहानियों के लिए हमारे चैनल को सब्सक्राइब करना ना भूलें।
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